भक्त होने के लिए एक और बात ख्याल रखनी पड़ेगी, वह यह कि तुमने जिसको अपना मन, अपना दिल अर्पण कर दिया है, उसका हो जाना पड़ेगा। अपने मालिक के प्रति समर्पण की एक ही शर्त होगी- जिसको तुमने अपने बहुत करीब मान लिया है, उसके हो जाओ। जिसे दिल के क़रीब माना है, तो फिर सारा दिन ख्याल तो उसी का आयेगा ना? अगर आपने अपने परमात्मा को सब कुछ माना है तो फिर सारा दिन उसका ख़याल क्यों नहीं आता, आप उसका नाम क्यों नहीं जपते। इसका मतलब या तो तुम्हारा कहना गलत है या तुम झूठे दावेदार हो। तुम्हारा ये कहना ही गलत है कि मैंने प्रभु को सब कुछ मान लिया है। अगर सब कुछ माना है तो फिर एक पल ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप उसको भूलकर रह सको।
कहा गया है कि अगर अपने परमात्मा को तू अपना मित्र मानता है, अपना स्वामी मानता है और कह दिया है कि ये मन तेरा हो गया… ये दिल अब तेरा हो गया; तो फिर इसका मतलब क्या है? ये मन अब और किसी का चिंतन नहीं करेगा, अब ये चिंतन करेगा तो केवल तेरा… तो फिर सारे दिन में और किसी का ख्याल नहीं आना चाहिये। मतलब यह कि तुम्हारा सारा दिन उस प्रभु के सिमरन में ही बीतेगा। कर्म भले ही कुछ भी करोगे, लेकिन ख्याल तो उसी का आयेगा। कबीर ने लिखा- “ज्यों तिरिया पीहर बसे, सुरत रहे पिय माहि।” विवाह हुए अभी दो चार महीने ही हुये हैं और मायके जाने का मौका मिला, अब वो मायके में रहती तो है, मायके के काम भी कर रही है, वहाँ अपनी सहेलियों से बातचीत भी करती है, लेकिन उसका पूरा ध्यान अपने पति की तरफ हर समय जाता है।
कहा गया है कि तुम अपने प्रिय से बिछुड़कर जिस दुनिया में आये हो, वह तो तुम्हारा मायका है…। वापिस अपनी ससुराल में ही जाना है और वहीं पर रहना है। तो जहाँ वापिस जाना है वहाँ का ख्याल लगातार बना रहे, तभी तो तुम्हारा समर्पण वास्तविक समर्पण कहा जाएगा। इसलिए मैं आपसे कहूँगा कि अपने प्रिय से, अपने सर्वस्व से, अपने प्रभु से सदैव जुड़े रहो, अपने मन को हमेशा उससे जोड़े रहो।