राष्ट्र व राज्य का विनाश या उत्थान दोनो राजा व प्रजा के सामूहिक कुकर्मों व सुकर्मों पर निर्भर करता है

सावधान देशवासियों;
आज देश बद से बदतर हालात में पहुँचाया जा चुका है!

यदि सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस “अरुण मिश्रा” जी को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ रहा हो कि–

“देश में कानून नही बचा, सुप्रीमकोर्ट बन्द कर देते हैं, देश छोड़ना ही बेहतर होगा”

तो विचार कीजिये हमारे देश के स्वतन्त्र सरकारी संस्थानों को कितना खोखला किया जा चुका होगा मौजूदा धूर्त शासनसत्ता व उसकी मानसिक गुलाम शासनव्यवस्था द्वारा?

अभी भी वक़्त है देशवासियों!
उठो, जागो और सही को चुनो, क्योंकि मौजूदा देश की शासनसत्ता में बैठे गिद्धों को आपकी या आपके पूर्वजों द्वारा दिए गए संविधान की कोई परवाह नही।

देश के लगभग सभी सरकारी इंस्टीट्यूशन आज धूर्त कुराजनैतिक कुशासनसत्ता के चँगुल में जकड़े जा चुके हैं जिनका दुरूपयोग कर वे हर दिन भारतीय सनातनी मूल आत्मा का चीरहरण खुलेआम करने से झिझक नही रहे।

75 वर्षीय भारतीय लोकतंत्र की मर्यादा को पिछले 8 सालों में मौजूदा शासनसत्ता द्वारा अनगिनत बार निम्नस्तर तक गिराया जा चुका है।

क्या यह काफ़ी नही समझने के लिए कि सबकुछ सोचसमझकर षड़यंत्र के तहत किया जा रहा है?

आज देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिकव्यवस्था व राजनैतिकव्यवस्था का मूल्य निम्न से निम्नतम स्तर तक आ चुका है! इसके पीछे का कुराजनैतिक षड़यंत्र क्या सचमुच समझ में नही आ रहा?

जिस देश की मूल आत्मा की पहचान वर्षों से सत्य (ईमान), प्रेम (मोहब्बत), न्याय (इंसाफ़) पुण्य (ज़कात) पर आधारित थी उसे आज असत्य (बेईमान), घृणा (नफ़रत), अन्याय (नाइंसाफ़ी), पाप (जुर्म) में परिवर्तित किया जा चुका है।

“यथा राजा तथा प्रजा, यथा प्रजा तथा राज्यम्।
यथा राज्यं तथा राष्ट्रम्, विनाशाय च उत्थाने सम्भवेत्।।” ..
अर्थात राष्ट्र व राज्य का विनाश या उत्थान दोनो राजा व प्रजा के सामूहिक कुकर्मों व सुकर्मों पर निर्भर करता है।

यदि किसी राष्ट्र का राजा या उसका कर्मचारी प्रजा द्वारा प्रदान की गई समस्त शक्तियों का “साम, दान, छल, दण्ड व भेद” रूपी पंच कूटनीतिक प्रपंच के माध्यम से अपनी ही प्रजा पर दुरूपयोग करने लगे और प्रजा को नारकीय यातनाएँ भोगने पर मजबूर करे तब उस प्रजा में से कुछ विवेकशील लोगों के समूह द्वारा प्रतिकार करना न्यायसंगत है व संविधान सम्मत भी है।

इसलिए हे मेरे देशवासियों अब समय आ गया है कि समस्त भारतभूमि पर फैले मौजूदा कुराजनैतिक भ्रष्टाचार, अनाचार, अव्यवहार को समाप्त करने हेतु उठो, जागो और एकजुट होकर प्रतिकार करो।

—✍ राम गुप्ता – स्वतंत्र पत्रकार