पृथ्वी-दिवस पर आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

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आज (२२ अप्रैल) ‘पृथ्वी-दिवस’ है। ऐसे अवसर पर
साहित्यजगत् के अधिनायक (तानाशाह) कबीरदास की पंक्तियाँ जीवन्त हो उठती हैं :–
“खोदखाद धरती सहै, काटकूट बनराय।
कुटिल बचन साधू सहै, औरन सहा न जाय।।”

यह सहिष्णुता (सहनशीलता) और क्षमाशीलता की पराकाष्ठा (सम्बन्धित भाव/रस की अन्तिम सीमा से परे की स्थिति) है। इसके बाद भी समाज मे एक वर्ग ऐसा है, जो ‘कृत्रिम परीक्षक’ के रूप मे दिखता है; यह पृथक् विषय है कि यदि उस वर्ग का परीक्षण किया जाये तो वह ‘सफलता’ से सुदूर ही लक्षित होता है। ऐसे परीक्षकों को ठोस धरातल की आवश्यकता है, जिस पर बैठकर वे आत्मचिन्तन की ओर प्रवृत्त हो सकें। धरती अर्थात् पृथिवी/पृथ्वी, वनप्रान्तर, साधु आदिक ‘क्षमा’ की प्रतिमूर्ति हैं। साधु एक प्रकार की प्रवृत्ति है, जो न्यूनाधिक प्रत्येक जीवधारी मे बनी रहती है। प्रवचन कर अपनी अहम्मन्यता की तुष्टि और पुष्टि करनेवाला उपदेशक साधु-आचरण की सभ्यता से कोसों दूर रहता है; क्योंकि उसका वस्त्र-विन्यास और विचार सात्त्विक प्रतीत होता है; परन्तु आचरण कुत्सित-कलुषित रहता है, जिसका हम नित्य-प्रति प्रत्यक्षीकरण करते आ रहे हैं।

एक पृथ्वी को, जो पृथ्वीनाथ पाण्डेय के नाम-रूप से समाज मे अपना शुचितापूर्ण सारस्वत वितान को ताने हुए है, जिसके नीचे बैठकर आज लाखों की संख्या मे अध्ययन के प्रति अदृश्य-दृश्य आग्रही जन सदाशयतापूर्वक स्वाध्याय की ओर अग्रसर हो रहे हैं, समझ पाना सहज नहीं है। ऐसा इसलिए कि उस संबोध-स्तर तक पहुँचने के लिए उसकी कठोर साधनापक्ष के साथ सम्पृक्त (सम्बद्ध) होना पड़ेगा, जो ‘हस्तामलक’ (सहज प्राप्य) नहीं है। सत्य यह है कि जब ‘मै’ ही पूरी तरह से ‘अपने को’ समझ नहीं पा रहा हूँ, जो उसका चरित्र जी रहा होता है तब आप अथवा अन्य कोई कैसे समझ सकते हैं?

हाँ, इतना अवश्य है कि पृथ्वीनाथ किसी ‘नाम’ की बैसाखी लेकर नहीं चलता। वह अपने जीवन-मूल्यों के प्रति जितना कठोर है, उतना ही मृदु भी। संवाद-प्रतिसंवाद करके देखिए, फिर आप-द्वारा पल्लवित-पुष्पित’ भ्रमान्धकार छँट जायेगा। आजतक किसी ने भी यह समझने का प्रयास ही नहीं किया– वह भाषा-स्तर पर शुचिता (पवित्रता) के प्रति इतना क्यों और कहाँ आग्रही है?

सच यह है कि आज कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि पृथ्वीनाथ उसकी दु:खती (‘दुखती’ अशुद्ध है।) रग का स्पर्श तक करे, जबकि वह हर किसी से कुछ-न-कुछ सीखता रहता है।

जो भी व्यक्ति जान-बूझकर भाषिक शुद्धता की उपेक्षा करता है और अनेकश: बताने-समझाने के बाद भी स्वयं को ‘संज्ञाशून्य’-सा अनुभव कराता रहता है, उसके प्रति वह निर्मम हो जाता है। जो व्यक्ति भाषा-साहित्य-शुचिता की दृष्टि से कर्मशील दिखता है; ऐतिहासिक पत्रिका का सम्पादन करता है; सारस्वत (सरस्वती से सम्बन्धित) अवदान करने की भूमिका मे दृष्टिगत होता है, वह यदि सामान्य स्तर पर भी व्याकरणिक अशुद्धियाँ करता है तो क्या उन अशुद्धियों पर दृष्टि निक्षेपित करने की आवश्यकता नहीं है? वस्तुत: उनकी अशुद्धियाँ उन तक ही सीमित नहीं रहतीं; प्रत्युत वायुमण्डल मे परिव्याप्त हो जाती हैं। शब्द जब शैक्षिक, बौद्धिक तथा साहित्यिक जगत् में सम्प्रेषित किये जाते हैं तब उनका निहितार्थ होता है; वे सोद्देश्य होते हैं तथा प्रयोजनमूलक-अभिमूलक भी।

विचक्षणजगत् अपने व्याख्यान मे शब्द को ‘ब्रह्म’ की संज्ञा देता है, तो क्या वह अशुचि शब्द-प्रयोग कर, अपने उसी ब्रह्म को कलुषित करने का पक्षधर हो सकता है? दो प्रकार के चेहरे ‘चेहरा’ पर मत लगाइए— कल दूसरा ‘पृथ्वीनाथ’ पैदा होगा, उतार फेंकेगा। शब्दों के साथ बल-प्रयोग मत कीजिए। आपने उसे जितनी भी उपाधियाँ दी हैं, नतमस्तक होकर उसने धारण कर ली हैं; क्योंकि नकारात्मक श्रद्धा का भी सम्मान करना चाहिए; वहीं से सकारात्मक द्युति (कान्ति, चमक) की सम्भावना बनती है। उपयुक्त अवसर आने पर पृथ्वीनाथ इन्हीं सम्मानों मे ‘और’ वृद्धि करते हुए, ‘चक्रवृद्धि ब्याज’ के रूप मे सम्बन्धित ‘विद्वज्जन’ को सादर लौटा देने का पक्षधर रहा है।

आज के समय मे प्रकाण्ड शब्दवेत्ता भी शब्द-संधान-अनुसंधान करने का साहस तक बटोर नहीं पाते, क्यों? विचारणीय और शोचनीय (‘सोचनीय’ अशुद्ध है।) प्रश्न बन जाता है।

आज विश्वविद्यालय-स्तर के हिन्दी-विषय के महिला-पुरुष प्राध्यापक, जो लाखों रुपये प्रतिमाह वेतन अर्जित कर रहे हैं, उनमे से अधिकतर ऐसे हैं, जिनका ‘वाचिक’ और ‘लिखित’ स्तर पर हिन्दी-भाषाप्रयोग नितान्त दयनीय है। ऐसे ही लोग आज पूर्व-जन्मों के सुकृत्यों के परिणामस्वरूप ‘अन्धों मे काना राजा’ की भूमिका का निर्वहण करते देखे जा रहे हैं।

‘अरण्यरोदन’ और ‘विधवा-विलाप’ वही करते हैं, जिनका नैतिक साहस समाप्तप्राय है। एक समय आयेगा, जब भाषा की उपेक्षा करनेवाले ‘समवेत स्वर मे सामाजिक रोदन’ करते हुए दिखेंगे, जो समाज मे उपहास (हँसी) के पात्र होंगे।

अब भी समय है, ऐसे जन चेत जायें।

शुभचिन्तक– पृथ्वीनाथ

(सर्वाधिकार सुरक्षित-- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)