यथार्थ की कोख से निकलती ‘मन की बात’

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


इस समय सम्पूर्ण देश शंका और संशय के गर्दो गुब्बार से ढँका हुआ है। भारतवासियों का स्वर्णिम भविष्य अनिश्चितताओं के कृष्ण मेघ ने आच्छादित कर रखा है। ‘अच्छे दिन’ दो दल बनाकर ‘न्यू इण्डिया’ के ‘आऊट-डोर’ स्टेडियम में ‘तू-तू, मैं-मैं का भगवाखेल’ खेलने में लगे हुए हैं। विजेता-दल को ‘विकास’ प्रमाणपत्र दिया जायेगा। देश का मुखिया ‘शौचालय’ से ‘सचिवालय’ तक की आधारशिला रखने से लेकर भक-भक अड्डा’ और ‘जलपरी’-‘उड़न परी’ का उद्घाटन तक करने में कीर्तिमान बना रहा है। देश में स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोज़गारी, अन्न-जल, सिर ढँकने के लिए छत आदिक की प्राथमिकताएँ ‘ढपोरशंखी’ हो गयी हैं। मुखिया भगवा, हिन्दू, मन्दिर, जयश्रीराम, गोरक्षण आदिक को अपनी बौद्धिक सम्पदा के रूप में ‘पेटेण्ट’ करवा चुका है, अर्थात् अब ‘ब्राण्ड हिन्दू’ होने का ‘सर्टिफ़िकेट’ मुखिया बाँट रहा है।
नट-नटी गले फाड़-फाड़ कर अपने-अपने हुनर का प्रदर्शन कर रही हैं। भाड़े के तमाशबीन/ तमाशाई ‘लोक’, ‘तंत्र’ के लुभावने संगीत पर नगर निगम से संसद् तक ‘ता ता थैया’ करते नज़र आ रहे हैं। ‘कमीनी’ कुर्सी कमीने तैयार करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। अफ़सोस ! मनुष्यता एक बार फिर पराजय के कगार पर है।