पृथ्वी-दिवस’ पर वैचारिक शत्रु-मित्र के नाम एक मुक्त पत्र

पृथ्वीनाथ पाण्डेय को जब ‘मैं’ ही पूरी तरह नहीं समझ पा रहा हूँ, जो उसका चरित्र जी रहा है तब आप अथवा अन्य कोई कैसे समझ सकता है?

पृथ्वीनाथ किसी ‘नाम’ की बैसाखी लेकर नहीं चलता। वह अपने जीवन-मूल्यों के प्रति जितना कठोर है, उतना ही मृदु भी। संवाद-प्रतिसंवाद करके देखिए, फिर आप-द्वारा पल्लवित-पुष्पित भ्रमान्धकार छँट जायेगा। आजतक किसी ने भी यह समझने का प्रयास ही नहीं किया :– वह भाषा-स्तर पर शुचिता के प्रति इतना क्यों और कहाँ आग्रही है?

सबसे बड़ा सच यह है कि आज कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि पृथ्वीनाथ उसकी दु:खती रग का स्पर्श तक करे, जबकि पृथ्वीनाथ हर किसी से कुछ-न-कुछ सीखना चाहता है।

जो व्यक्ति जान-बूझकर भाषिक शुद्धता की उपेक्षा करता है, उसके प्रति वह निर्मम हो जाता है। जो व्यक्ति भाषा-साहित्य-शुचिता पर कार्य करता-कराता है; ऐतिहासिक पत्रिका का सम्पादन करता है, वह यदि सामान्य स्तर पर भी व्याकरणिक अशुद्धियाँ करता है तो क्या उन पर दृष्टि निक्षेपित करने की आवश्यकता नहीं है? उसकी अशुद्धियाँ उस तक ही सीमित नहीं रहतीं; प्रत्युत वायुमण्डल में परिव्याप्त हो जाती हैं। शब्द जब शैक्षिक बौद्धिक तथा साहित्यिक जगत् में सम्प्रेषित किये जाते हैं तब उनका निहितार्थ होता है; वे सोद्देश्य होते हैं। आप अपने व्याख्यान में शब्द को ‘ब्रह्म’ की संज्ञा देते हैं, तो क्या आप अशुचि शब्द-प्रयोग कर अपने उसी ब्रह्म को कलुषित करने के पक्षधर हैं? दो प्रकार का चेहरा ‘चेहरे’ पर मत लगाइए— कल दूसरा ‘पृथ्वीनाथ’ पैदा होगा, उतार फेंकेगा। शब्दों के साथ बल-प्रयोग मत कीजिए। आपने मुझे जितनी भी उपाधियाँ दी हैं, नतमस्तक होकर धारण कर ली हैं; क्योंकि नकारात्मक श्रद्धा का भी सम्मान करना चाहिए; वहीं से सकारात्मक द्युति की सम्भावना बनती है।उपयुक्त अवसर आने पर पृथ्वीनाथ इन्हीं सम्मानों में ‘और’ वृद्धि करते हुए सम्बन्धित ‘विद्वज्जन’ को सादर लौटा देने का पक्षधर है।
आज के समय में प्रकाण्ड शब्दवेत्ता भी शब्द-संधान-अनुसंधान करने के लिए साहस तक नहीं बटोर पाता, क्यों? विचारणीय और शोचनीय प्रश्न है।

आज विश्वविद्यालय-स्तर के हिन्दी-विषय के प्राध्यापक, जो लाखों रुपये माह वेतन अर्जित कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर ऐसे हैं, जिनका उच्चारण और लिखित स्तर पर हिन्दी-भाषाप्रयोग नितान्त दयनीय है। पूर्व-जन्मों के सुकृत्यों के परिणामस्वरूप आज ‘अन्धों में काना राजा’ की भूमिका का निर्वहन करते देखे जा रहे हैं।
अरण्यरोदन वही करते हैं, जिनका नैतिक साहस समाप्तप्राय है। एक समय आयेगा, जब भाषा की उपेक्षा करनेवाले ‘समवेत स्वर में सामाजिक रोदन’ करेंगे।
अब भी समय है, ऐसे जन चेत जायें।


आप सभी का अपना
पृथ्वीनाथ