नागपंचमी और गुड़िया का त्यौहार

‘नागपंचमी’ शब्द से तो मैं गांव से बाहर निकलने के बाद परिचित हुआ। बचपन से नागपंचमी को हम ‘गुड़िया का त्यौहार’ बोलते आए हैं।

गुड़िया के त्यौहार से एक दिन पूर्व हमारे घरों में काले चने भिगो दिए जाते थे।अगले दिन सुबह उनकी घुघुरी बनती। कुछ घुघुरी और दूध दोने में भरकर सांप की बॉबी या घर की किसी नाली या किसी ऐसे ही स्थान पर रख दिया जाता था ताकि नाग देवता आकर इसे ग्रहण कर सकें। गुड़िया के दिन दोपहर को कड़ाही चढ़ती यानि पक्का खाना- पूड़ी, सब्जी, खीर आदि बनती।

इस दिन गांव का डोm सभी घरों में आकर छूल या किसी अन्य पेड़ के डंडे घर के सभी पुरुष सदस्यों (बच्चों सहित) के लिए दे जाता। शाम को सभी घरों से लड़कियां कपड़ों की गुड़िया और घुघुरी किसी डलिया में 5, 7, 9 11 की संख्या में रखकर और उसे किसी रंगीन, नक्काशीदार कपड़े से ढककर गांव के एक नियत स्थान पहुंच जाती। हमारे गांव बरी में नउवन टोला और स्वर्गीय श्री राम शरण सिंह के घर के बीच वाले रास्ते पर गांव भर से लड़कियां गुड़िया लेकर पहुंचती थी।

लड़के और पुरुष छूल के डंडे या अरहर की लग्गी या किसी ऐसे ही डंडे को लेकर उसी स्थान पर पहुंचते। कुछ बच्चे डंडों को रंग लिया करते थे और कुछ डंडे के अगले भाग मे लाल कपड़ा बांध लिया करते थे। फिर लड़कियां गुड़ियों को एक जगह डाल देती और लड़के डंडे से उन गुड़ियों को पीटते थे । सभी लड़के और पुरूष खेल करते हुए कभी गुड़ियों को ऊपर उछलते,कभी नीचे गिराकर पीटते। फिर सभी डंडों को एक दूसरे में फंसाकर डोली जैसा बना लिया जाता और उसमें किसी एक व्यक्ति को बैठाकर पास के तालाब तक ले जाया जाता। इस दौरान खूब हंसी-ठिठोली और हल्ला गुल्ला होता। डलियों में सभी घरों से लाई हुई घुघुरी डोम को दे दी जाती और फिर सब लोग हंसी खुशी अपने घर लौट आते।

कुछ परम्पराएं यूं ही चलती रहती हैं जिनका आमजन को अर्थ भी पता नहीं होता। मुझे भी अपनी युवावस्था तक यह समझ नहीं आया कि जिस अवध क्षेत्र में लड़कियों को देवी का दर्जा दिया हुआ है। किसी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा की जाती है, नवरात्रों में उनके पैर धोए जाते हैं और किसी दूर की यात्रा में जाते समय सबसे अंत में उनके पैर छुए जाते हैं, उन्ही कन्याओं की प्रतिरूप गुड़ियों के प्रति इस तरह का सरेआम दुर्व्यवहार अवध जैसे सुसंस्कृत क्षेत्र में क्यों किया जाता है ? सबसे बड़ी बात यह कि इस अपमानजनक व्यवहार को सामाजिक मान्यता भी प्राप्त है??

बहुत बाद में पता चला कि इसके पीछे एक कथा है कि कोई लड़का शंकर भगवान का बहुत बड़ा भक्त था । वह प्रतिदिन महादेव और नाग देवता की पूजा करता था। महादेव की तो उस पर कृपा थी ही, नाग देवता भी प्रेमवश उस लड़के के पैरों में लिपट जाया करते थे।

एक दिन जब वह पूजा करने गया तो उसकी बहन भी साथ हो ली। रोज की तरह जैसे ही नाग देवता लड़के के पैरों में लिपटे, उसकी बहन डर गई। इससे पहले कि उसका भाई उसे कुछ बताता और समझाता, उसने एक डंडा उठाकर नाग देवता को पीट-पीटकर मार डाला।

बाद में उसके भाई ने उसे सारी कहानी बताई । लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अज्ञानतावश या भूलवश ही सही, वह लड़की पाप तो कर चुकी थी। इसलिए उस दिन से उसके पाप की सजा देने के लिए गुड़ियों को उसका प्रतिरूप मानकर उसे डंडों से पीटा जाता है।

एक अन्य कथा यह है कि नागराज तक्षक के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गयी,तब राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने नागों के विनाश के लिए नाग यज्ञ करवाया। अपनी जान बचाने के लिए तक्षक इंद्रासन में छुप गया परन्तु तक्षक की पत्नी ने तक्षक के छुपने का राज बता दिया था।
तक्षक की पत्नी को दंड देने के लिए ही यह त्योहार मनाया जाता है।

यह तो खैर मान्यताएं या किवदंतियां हुई लेकिन मुझे लगता है कि हिंदू धर्म ग्रंथो में प्रत्येक जीव के प्रति दया का भाव रखने के लिए उसे किसी देवता से जोड़ दिया जाता है। हाथी को गणेश से, उल्लू को लक्ष्मी से, हंस को सरस्वती से और सांप को भगवान शंकर से जोड़कर उन जीव- जंतुओं की पूजा की जाती है। यह हमारे सनातन धर्म की सह अस्तित्व की भावना तथा सभी जीवों के प्रति करुणा को दर्शाता है।

सांपों के प्रति श्रद्धा भाव का पौराणिक कारण यह है कि लोकहित के लिए समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत से लिपट कर समुद्र मंथन में सहायता नागराज वासुकि ने की थी। शायद अपने इसी परोपकारी स्वभाव के कारण नागराज वासुकि भगवान शंकर के गले में स्थान पाते हैं।

जिन युवाओं को पौराणिक कथाओं और लोक कथाओं में भरोसा नहीं है, उनको भी सांपों के प्रति श्रद्धाभाव इसलिए रखना चाहिए क्योंकि अन्नदाता किसानों की फसल के सबसे बड़े शत्रु चूहे हैं और सांपों का मुख्य आहार चूहा है। इस नाते सांप किसानों के साथ साथ सभी अन्न खाने वालों के मित्र हैं।

इसलिए श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को अनजाने में भी सांपों का अहित करने वालों का तिरस्कार करना और मानव जाति के मित्र नागराज का संरक्षण करने का संकल्प लेना और उनके प्रति श्रद्धा रखना हम सब का पुनीत कर्तव्य है।

आशा विनय सिंह बैस
ग्राम- बरी, पोस्ट- मेरुई, जनपद- रायबरेली (उत्तर प्रदेश
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