प्रकृति से ‘परा-प्रकृति तक’ सम्पन्न
प्रकृति-संरक्षण मंच ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ की ओर से २५ दिसम्बर को ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज में पर्यावरण-विषयक एक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन हुआ।
इस अवसर पर प्रसिद्ध शाइर अनवार अब्बास को ‘साहित्यकोविद’ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पू्र्व अँगरेज़ी विभागाध्यक्ष प्रो० सुरेशचन्द्र द्विवेदी को ‘साहित्यभारती’ सम्मान से मुख्य अतिथि आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने आभूषित किये। सम्मान के अन्तर्गत प्रशस्तिपत्र, शाल, हिन्दीभाषा-साहित्य की पुस्तक, लेखनी तथा नववर्ष कैलेण्डर दिये गये थे।
समारोह के मुख्य अतिथि चर्चित शाइर अनवार अब्बास ने कहा, “प्रकृति ने हमें वह सब कुछ दिया है, जो ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी है। हम प्रकृति से जुड़े नहीं, बल्कि उसे जोड़ने की कोशिश की। हम भूल गये कि प्रकृति हमारा संरक्षण करती है।”
समारोह की अध्यक्षता करते हुए, भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “प्रकृति से पराप्रकृति की यात्रा एक अबूझ पहेली है, जिसका अनुभव भी नहीं किया जा सकता। अभी तो हम अपनी प्रकृति को ही नहीं समझ पाये हैं, फिर उसके परम रूप ‘परा’ का बोध होना ‘सच्चिदानन्द’ का सान्निध्य प्राप्त करना-जैसा है, जो कि एक विलक्षण मन:स्थिति होती है।”
सारस्वत अतिथि के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व- अँगरेज़ीविभागाध्यक्ष प्रो० सुरेशचन्द्र द्विवेदी ने कहा, “पर्यावरण बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की नहीं है, बल्कि हमारी भी है।”
नागरिक पी०जी० कॉलेज, जंघई में मनोविज्ञान-विभागाध्यक्ष डॉ० रवि कुमार मिश्र ने समाज में व्याप्त सम्बन्ध-प्रदूषण की चर्चा की।
संचालक और संस्थाध्यक्ष डॉ० प्रदीप कुमार चित्रांशी ने कहा, “जो लोग नदियों में सिक्का डालते हैं, वे लोग भूल जाते हैं कि सिक्के में विषैला क्रोमियम होता है, जो कैंसर रोग को जन्म देता है। उनके वैसा करने से नदियाँ विषैली हो जाती हैं।”
आलोक चतुर्वेदी ने लेखन-प्रकाशन में व्याप्त प्रदूषण पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के अन्त में शिक्षाजगत् के प्रख्यात हस्ताक्षर शम्सुरर्हमान फ़ारुक़ी के निधन पर शोकसभा कर श्रद्धांजलि दी गयी।