उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रियंका की दहाड़– “लड़की हूँ… लड़ सकती हूँ”

प्रियंका गान्धी/वाड्रा ने उत्तरप्रदेश के राजनैतिक मैदान में अपना पहला तीर चलाकर विपक्षियों को सचेत और सावधान कर दिया है :–
“लड़की हूँ… लड़ सकती हूँ।”

१९ अक्तूबर को उत्तरप्रदेश की राजधानी और राज्य के प्रमुख राजनैतिक केन्द्र ‘लखनऊ में एक पत्रकार-वार्त्ता का आयोजन कर, आगामी विधानसभा-चुनाव में चालीस प्रतिशत महिलाओं को चुनावी टिकट देने का एलान कर दिया है, जो वास्तव में, महिला शक्तीकरण (‘सशक्तिकरण’ और ‘सशक्तीकरण’ अशुद्ध हैं।) की दिशा में ‘कल’ तक ‘वेण्टिलेटर’ पर लेटी हुई काँग्रेस पार्टी की ओर से चले गये ‘ट्रम्प कार्ड’ के रूप में देखा जा रहा है। इससे काँग्रेस उत्तरप्रदेश में “दो-दो हाथ” करने के लिए मैदान में ज़ोर-आज़्माइश करेगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
वर्ष २०२२ के आरम्भ में कराये जानेवाले उत्तरप्रदेश-विधानसभा के चुनाव में काँग्रेस-महासचिव प्रियंका ने देश की समस्त महिलाओं का आह्वान किया है, “आप राजनीति में आइए! आगे आइए! काँग्रेस का दरवाज़ा हर महिला के लिए बिना किसी भेदभाव के खुला हुआ है। मेरे कन्धे-से-कन्धा मिलाकर चलिए।” प्रियंका ने आगे कहा, “यह एक शुरुआत है; आनेवाले समय में यह प्रतिशत बढ़ सकता है।”

प्रियंका ने उपर्युक्त घोषणा कर सभी विपक्षियों की नीद ख़राब कर चुकी हैं। इसे चुनावी मैदान में प्रियंका की रणभेरी के रूप में देखा जा रहा है। प्रियंका को मालूम है कि उनके दल को खोने के लिए कुछ भी नहीं है; लेकिन इससे कम-से-कम उनकी काँग्रेस को पहले से मज़्बूती तो मिलेगी। निश्चित रूप से उत्तरप्रदेश के राजनैतिक दलों के चुनावी समीकरण पर उपर्युक्त घोषणा भारी पड़ती दिख रही है।

स्मरणीय है कि पिछले चुनाव में काँग्रेस ने अपनी अविस्मरणीय पराजय से अवश्य सीख ग्रहण की होगी। उत्तरप्रदेश में बेहद घटिया जातीय-वर्गीय राजनीति के चलते, इस राज्य का हर स्तर पर ह्रास होता आ रहा है, जिसके लिए ‘हिन्दू-मुसलमान’ और ‘राम-रहीम’ की गर्हित राजनीति करनेवाला एकमात्र दल ‘भारतीय जनता पार्टी’ उत्तरदायी रहा है। उत्तरप्रदेश में जिस प्रकार से महिलावर्ग के साथ आतंकी व्यवहार का दुष्परिणाम दिखता आ रहा है, उस दृष्टि से ”लड़की हूँ…लड़ सकती हूँ” का एलान विरोधियों, विशेषत: सत्तारुढ़ दल की छाती पर मूँग दलता हुआ नज़र आने लगा है। इस पर चारों ओर से विपक्षियों के बयान ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो बेचैन पागल कुत्ते हर ओर से खोंखिया रहे हों; परन्तु प्रियंका का ‘सुदर्शन चक्र’– “लड़की हूँ…लड़ सकती हूँ”, सभी के हथकण्डों को नाकाम करता आ रहा है। मायावती की ‘दलित राजनीति’ की चूलें हिलने लगी हैं; उधर, अखिलेश यादव की कुलबुलाहट भी सार्वजनिक होने लगी है।
बहरहाल, प्रियंका के इस ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रभाव दिखना शुरू हो चुका है और विपक्षियों की छटपटाहट नेपथ्य से बाहर आने लगी है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० अक्तूबर, २०२१ ईसवी।)