वायुसेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात वर्तमान संस्थान में जब मैं नया-नया आया, तो हमारी ब्रांच में एक शांत, सौम्य और सुदर्शन व्यक्तित्व के अधिकारी थे। मैंने नोट किया कि जो भी उन्हें मिलने आता उन्हें “गुरुजी” कहकर संबोधित करता था। ब्रांच के भी अधिकतर लोग उन्हें “गुरुजी” ही कहते थे।
शुरू में मुझे लगा कि शायद वे सचिवालय में आने से पहले शिक्षक रहे होंगे, इसलिए लोग उन्हें गुरुजी कहते हैं। या फिर शायद ब्राह्मण होंगे, पूजा-पाठ कराते होंगे, इसलिए गुरुजी कहे जाते होंगे। या फिर हो सकता है किसी धार्मिक संस्था से जुड़े होंगे, इसलिए लोग उन्हें गुरुजी कहते होंगे। परंतु धीरे-धीरे मुझे पता चला कि मेरे सभी कयास, सभी अनुमान गलत थे।
असल में, जिन्हें लोग “गुरुजी” कहते थे, उनका वास्तविक नाम श्री राजेश सिंह शेखावत था। वे सचिवालय में राजपत्रित अधिकारी थे। उनकी पत्नी सरकारी विद्यालय में शिक्षिका हैं और दामाद बैंक में मैनेजर हैं। राजस्थान के जमींदार परिवार से आते हैं, यानि घर से भी संपन्न और प्रतिष्ठित हैं। लेकिन “गुरुजी” यानि श्री राजेश सिंह शेखावत, स्वभाव से इतने सहज और विनम्र हैं कि लोग उन्हें आदरवश “गुरुजी” कहने लगे।
वह कभी किसी बात पर क्रोधित नहीं होते, किसी से कोई शिकायत नहीं करते, न ही कभी किसी की निंदा करते हैं। चाहे देर तक ऑफिस में रुकना हो या छुट्टी के दिन आना पड़े, वे कभी कोई बहाना नहीं बनाते। अपने उच्च अधिकारियों से तो वह सम्मान से बात करते ही हैं, अधीनस्थ कर्मचारियों से भी हमेशा मधुर व्यवहार रखते हैं। उनकी सबसे दोस्ती है, किसी से भी बैर नहीं है। वे सचमुच अजातशत्रु हैं।
एक बार सचिवालय के किसी युवा कर्मचारी ने हँसते हुए उनसे पूछ लिया-
“सर, आप तो क्षत्रिय हैं, इतने शांत और विनम्र कैसे रह लेते हैं?”
इस पर गुरुजी मुस्कराए और बोले-” जब समय की आवश्यकता थी, तब जिन्होंने शस्त्र उठाये, वह क्षत्रिय कहलाये। फिलहाल यह कार्य देश की सेना और पुलिस कर रही है। जो भी देश और समाज की रक्षा कर रहा है, वह क्षत्रिय है। उनमें उग्रता होना आवश्यक है, उनके कार्य की जरूरत है। मैं लिखापढ़ी का कार्य कर रहा हूँ, इस कार्य में उग्रता की भला क्या आवश्यकता? इसलिए मैं शांत और विनम्र रहता हूँ। वैसे भी मैं भगवान कृष्ण का भक्त हूँ, वह सबसे प्यार करते थे, इसलिए उनका अनुयायी होने के नाते मैं भी सबसे स्नेह करता हूँ।”
“अच्छा, क्या आपने कभी शराब नहीं पी? नॉनवेज नहीं खाया?” उस युवा कर्मचारी ने जिज्ञासा व्यक्त की।
“मैं पहले सब करता था, पर अब छोड़ दिया है।” गुरुजी ने शांतचित्त होकर जवाब दिया।
“कब से छोड़ दिया है सर?” उसकी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी
गुरुजी इस बार हल्का सा मुस्कराते हुए बोले-” जब तुम शायद जन्में भी नहीं थे, तब से मैंने इन चीजों का त्याग कर दिया। मैंने 18 वर्ष की उम्र के बाद इन चीज़ों को हाथ नहीं लगाया।”
यह सुनकर सब हैरान रह गए, क्योंकि जिस उम्र में लोग अमूमन इन व्यसनों की चपेट में आते हैं, उस समय तक गुरुजी इन सबसे मुक्ति पा चुके थे। इनकी बुराइयों को समझ चुके थे।
अभी कुछ दिनों पूर्व , 23 अप्रैल को मैंने अपने विवाह की सिल्वर जुबली — यानि 25वीं वर्षगांठ — मनाई। तो उस शुभ अवसर पर गुरुजी बिलकुल एक सच्चे गुरु की तरह हम सभी को स्नेह और आशीर्वाद देने आए।
पद, प्रतिष्ठा, पैसा जैसे तमाम सांसारिक सुख होने के बावजूद गुरुजी को लेशमात्र का भी अहम नहीं है, घमंड उन्हें छू तक नहीं गया है। तमाम साधु, संत, कथावाचक इस मायावी संसार में जिस निर्लिप्त और सादगीपूर्ण जीवन का बखान करते नहीं थकते, ‘गुरुजी’ उसका प्रत्यक्ष, सशरीर उदाहरण हैं।
गुरुपूर्णिमा
(विनय सिंह बैस)
“गुरुजी” के शिष्य