कल का गुरु ‘ज्ञान’ कराता था; आज का ‘Sir’ ‘उत्पाद’ (Product) बेचता है

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज के अधिकतर गुरु अर्थात् तथाकथित ‘Sir’ अपने गर्हित आचरण की स्थापना ‘स्वयं’ कर चुके हैं। वे स्वयं को बाज़ार मे ‘विक्रेता’ के रूप मे उतार चुके हैं और ‘ज्ञान’ को एक उत्पाद के रूप मे। यही कारण है कि आज के क्रेताओं (विद्यार्थियों) को नैसर्गिक ज्ञान-रस की प्राप्ति नहीं हो पाती। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि चरित्र-चाल-चेहरा से आज का औसत विद्यार्थी अंशतः भी ‘विद्यार्थी’ के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में समर्थ नहीं बन पाता। आज के कथित गुरुओं ने ‘coaching’ के चमत्कार का एक ऐसा वितान तान दिया है, जिससे माता-पिता और अभिभावक सम्मोहित होकर खिंचे चले आते हैं और नितान्त अपात्र गुरुओं के गुणानुवादी स्वर (Extolling voice) में स्वयं का भी स्वर मिलाने लगते हैं।

एक तो वैसे ही हमारी शिक्षा और परीक्षा-पद्धतियाँ इतनी कलंकित, कुत्सित, कलुषित हो चुकी हैं कि अर्हता, अभियोग्यता इत्यादिक के मापदण्ड तिरोहित हो चुके हैं। बिचौलियों ने देश की स्वाभाविक गति-प्रगति के मूल मे ‘दीमक’ का चरित्र अपना लिया है। महाविद्यालय-प्रबन्धक ‘असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर’ बनाने के लिए २० से २५ लाख ले रहे हैं और कुपात्र अध्यापक नोट की गड्डी लेकर ‘नियुक्तिपत्र’ पाने की बाट जोह रहे हैं। वर्तमान नियुक्ति-परिदृश्य को समझने का प्रयास हम करते हैं तब कुपात्र अभ्यर्थी ‘भारतीय जनता पार्टी’, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ तथा ‘विश्व हिन्दू परिषद्’ के मठाधीशों की सिफ़ारिशों पर विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों मे ‘असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर बनाये जा रहे हैं। ऐसे मे, यदि ‘रेडीमेड’ चाटुकार अध्यापकों (महिला-पुरुष) से हम गुणवत्तापूर्ण ज्ञान की अपेक्षा करते हैं तो यह हमारी भूल है।

यह रोग वर्तमान शासनकाल मे ही नहीं है; अपितु वर्षों से चला आ रहा है, जो वर्तमान अधिनायक-शासनकाल मे नितान्त बीभत्स रूप मे हमारे शैक्षणिक क्षेत्र को अपने अधिकार मे ले चुका है।

मै इलाहाबाद की बात, विशेषत: करना चाहता हूँ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, सी० एम० पी० डिग्री कॉलेज, ईश्वरशरण डिग्री कॉलेज, आर्यकन्या डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद (अग्रवाल) डिग्री कॉलेज, महिला सेवा सदन डिग्री कॉलेज, सदनलाल साँवल दास खन्ना इत्यादिक महाविद्यालयों मे नियुक्तियाँ वास्तविक योग्यता के आधार कितनी होती हैं, इसका सार्थक उत्तर, की गयी सभी नियुक्तियों की बारीक़ और निष्पक्ष जाँच कराने पर ही, प्राप्त किया जा सकता है।

निस्सन्देह, ‘सबको शिक्षा’ जैसा छलावापूर्ण नारा देश की शिक्षा-व्यवस्था के गाल पर तमाचा मार रहा है; क्योंकि यह समय-सिद्ध हो चुका है कि जब तक रिश्वत देने के लिए २०-२५ लाख रुपये न हों; तगड़ा ‘सोर्स’ न हो; सत्ता के ठीकेदारों तक पहुँच न हो तब तक विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों की नौकरी मिलनी ‘नामुमकिन’ के बराबर दिखती है; कारण कि नियुक्ति के खेल के अन्तर्गत ‘इतने खेल’ (इन-डोर और आऊट-डोर) शामिल कर लिये जाते हैं कि खेलते-खेलते सोर्स-सिफ़ारिशविहीन अभ्यर्थियों के पसीने छूटने लगते हैं।

कुछ ऐसे भी विश्वविद्यालय हैं, जो ‘समरूप विश्वविद्यालय’, ‘मुक्त विश्वविद्यालय’ इत्यादिक के नामो से चर्चित हैं; परन्तु वहाँ भी योग्यता नहीं, लेन-देन और सोर्स-सिफ़ारिश’ का बोलबाला है, जिनके कारण वहाँ का अध्ययन-अध्यापन का परिवेश ‘प्रश्नो के घेरे’ में आ चुका है।

आज का ‘Sir’ चामत्कारिक ढंग से अर्थात् तामसिक वातावरण उपस्थित कर, अपने सम्पूर्ण अज्ञान को ‘ज्ञान’ के रूप मे प्रस्तुत कर रहा है। जिस विषय का वह स्वयं को विशेषज्ञ कहता है, उसकी मूल अवधारणाओं से ही वह परिचित नहीं है। यही कारण है कि हमारा विद्यार्थिवर्ग समुचित शिक्षण के नाम पर ठगा जा रहा है।
ऐसे मे, यदि देश का कथित विद्यार्थि-वर्ग आजीवन बेरोज़गारी से जूझ कर; थक-हार कर छिनैती करता है; लड़कियों के साथ घिनौना कृत्य करते हुए तेज़ाब से जलाने की धमकी देता है ; ‘बाइकर्स गैंग’ का सरगना बनता है; डक़ैती करता है; सुपाड़ी लेकर हत्याएँ करता है तो इसमे उस बेचारे का क्या दोष? वहीं कोचिंग के नाम पर घर से निकली लड़की रात में अपने तथाकथित बॉयफ्रेंड के साथ किसी पार्क मे मस्ती करती है और कुछ दिनो-बाद वह तितली-जैसी बनकर फुर्र हो जाती है तो इसमें उस बेचारी लड़की का क्या दोष? मा-बाप कभी यह जानने की कोशिश करते हैं कि उनकी बेटे-बेटियाँ कोचिंग की नाम पर कहाँ जाती हैं और क्या करती हैं।
प्राय: ऐसा देखा गया है कि मा-बाप/अभिभावक अपनी सन्तान/पाल्य-पाल्या को बाहर के छात्रावासों मे प्रवेश दिलाकर, हर माह बड़ी धनराशि भेजकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं; उनके बच्चों की दिनचर्य्या क्या है; अध्ययनपद्धति/प्रणाली क्या है, इसे जानने का प्रयास तक नहीं करते हैं। ऐसे मे, होता यह है कि अधिकतर लड़के-लड़कियाँ इतनी बिगड़ैल हो चुकी रहती हैं कि उन्हें अनुशासन की मुख्य धारा मे ला पाना “टेढ़ी खीर” हो जाता है।

जो विद्यार्थी और अध्यापक वास्तव मे, योग्य हैं और पठन-पाठन को संस्कारित करते हुए, अपने-अपने दायित्व का बहुविध निर्वहण कर रहे हैं, वे सभी “काजल की कोठरी” मे हैं; किंचिन्मात्र प्रमाद उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

उक्त शैक्षणिक संस्थानो के ‘असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर’ प्रतिमाह डेढ़ लाख से ढाई लाख के मध्य की धनराशि वेतन के रूप में हथियाते हैं। मैने ‘हथियाते’ का प्रयोग इसलिए किया है, क्योंकि वर्ष मे कितने कार्यदिवस निर्धारित हैं और उतने कार्यदिवस मे कितनी अध्यापक-अध्यापिकाएँ जाती पढ़ाने के लिए जाती हैं; यदि नहीं जाती हैं तो कहाँ रहती हैं; आये-दिन छात्रसंघ की दूषित राजनीति तथा अन्य अराजक गतिविधियों से निर्धारित कार्यदिवस कितना बाधित होता है, इसका संज्ञान नहीं किया जाता है। विद्यार्थियों से तो पूरे सत्र का शुल्क ‘ऑन लाइन’ ले लिया जा रहा है; परन्तु पढ़ाई कितने महीने होती है, इसका हिसाब करके विद्यार्थियों को शेष धनराशि लौटायी जाती है? उत्तर है— नहीं। फिर प्रतिप्रश्न है, जितने माह अध्यापनकार्य नहीं हुए हैं, उतने माह की शैक्षणिक धनराशि अध्यापकों के वेतन से क्यों नहीं काटी जाती? यह नियम शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर लागू करना चाहिए।

शिक्षा-क्षेत्र में बहुत विसंगतियाँ हैं, जिनको दूर करने के लिए कठोर अनुशासन लागू करना होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ जुलाई, २०२२ ईसवी।)