
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक :
कल तक था जो जगद्गुरु, भ्रष्ट बन गया देश।
दिखते सब बहुरुपिये, तरह-तरह के वेश।।
दो :
कुम्भकर्णी सब नींद में, नहीं किसी को होश।
बाँट देश को सब रहे, लोकतन्त्र बेहोश।।
तीन :
क़लम बिकाऊ दिख रहे, बिकते हैं हर रोज़।चाहत दारू-दाम की, नयी-नयी अब खोज।।
चार :
न्यायतन्त्र रुग्ण यहाँ, कितना यहाँ अँधेर।
एड़ी जनता है घिसती, होता बहुत अबेर।।
पाँच :
रक्त-सम्बन्ध खो रहे, अपनों का विश्वास।
ऐसे में कैसे भला, हो ग़ैरों से आस।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २० जून, २०१८ ई०)