ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

कविता : स्त्री

आकांक्षा मिश्रा :

एक स्त्री
आधी से ज्यादा दूरी अकेले
तय करती हैं ,
तुम्हारे सारे अधिकारों को कर्तव्य मानकर
सफर जारी करती हुई
तुम्हें मुक्त कर देती हैं
मुड़कर मत देखो ,अधूरी रहेगी
सारी इच्छाये ,दौड़ों मत आशाएं कभी तोड़ती नहीं
स्वभाव में यह प्रवृत्ति विद्दमान रही
जिज्ञासा हर समाधान नहीं
खोज में अनवरत चलते रहोगे
मिल जायेगा सब कुछ ,
तब भी बिखरते रहोगे
वापस आना कायरता होगी
चलते जाना यात्रा होगी
स्त्री सब से पर तुम्हें सोचती हैं
देह की नदी
सागर होती हैं ,आँखें भर लाती हैं
आँसुओं को
अपने गम को तुमने बाँटा ही नहीं ,बाँटना भी चाहा तो वक्त नहीं दिया
वक्त गुनाहगार होता चला गया
तुम शिकायते बेशुमार करते गए
जिस दिन स्त्री को देह से मुक्त देखोगे
तुम्हारे पथ की साथी होगी
यहाँ तुम विश्राम करके
अपनी आगामी यात्रा जारी रख सकोगे
जितना सोचते हो ,
उससे ज्यादा स्त्री सोचती हैं
बिना किसी आहट के
तुम अभी भी मुक्त हो
स्त्री कभी बांधती नहीं मुक्त कर देती हैं ।

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