जगन्नाथ शुक्लम ✍️ (प्रयागराज) :

पैरों तले ज़मीन नहीं है, आसमान में कैसे खिलता?
बिना मुखर व्यक्तित्व बनाये, यहाँ हमारी कौन सुनेगा?
मानदण्ड की सीढ़ी टूटी,
टूटी मानवता की रीढें।
आड़े-तिरछे चलने वालों;
को ही मिलते ऊँचे पीढे।।
दिल से निकले शब्दों से फ़िर,कौन यहाँ पर वाक्य बुनेगा।
बिना मुखर…..
नदियों की कृशता से लगता;
सूख गई पर्वत की छाती।
विरह व्यथित रहते प्रेमीकुल;
मेघ न ले जाते अब पाती।।
पथराई आँखों की लिपियाँ, रक्तिम स्याही कौन पढ़ेगा?
बिना मुखर……..
इन्द्रासन भी नहीं डोलते,
दानव को दानव है घेरे।
संस्कार सब स्वाहा हो गये,
नीति छोड़ लेते सब फेरे।।
अस्त-व्यस्त है राष्ट्र-पताका , सुलझाने को कौन बढ़ेगा?
बिना मुखर……….
संविधान की कसमें खा कर,
संविधान ही नोंच रहे हैं।
उसमें वर्णित राष्ट्रधर्म को,
धीरे – धीरे पोंछ रहे हैं।
आहत मन को राहत देने , वाली बातें कौन गढ़ेगा?
बिना मुखर……