— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वह हवा क्या, जिसकी कोई रवानी न हो,
वह वफ़ा क्या, जिसकी कोई दीवानी न हो।
ये अन्दाज़े बयाँ जज़्बात की अँगड़ाइयाँ हैं,
वह लफ़्ज़ क्या, जिसमें आग और पानी न हो।
हिज़्र की आग में कुछ लोग ही जला करते हैं,
वह महब्बत क्या, जिसमें कोई निशानी न हो।
बिसात बिछा शातिर उम्मीद में हैं बैठा करते,
वह चाल क्या, जिसमें कोई नादानी न हो।
यों तो लोग अक्सर मर-मर कर जीते हैं रहते,
वह शख़्स क्या, जिसकी कोई कहानी न हो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ जून, २०२० ईसवी)