आग लगा दो नीति मे, नंगा कर दो राज

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
कहें देश की बेटियाँ, शासक धोखेबाज़।
हाथी-जैसे दाँत हैं, उगल रहे हैं राज़।।
दो–
चुप्पी साधे दिख रहा, घर का चौकीदार।
चोरों से है जा मिला, ले रूप ख़रीदार।।
तीन–
होता शोषण यौन का, सबको इसका ज्ञान।
राजनीति की आड़ मे, मर्दन होता आन।।
चार–
न्याय यहाँ का मौन है, उसका भी व्यापार।
बिलख रही हैं बेटियाँ, महिमा अपरम्पार।।
पाँच–
आग लगा दो नीति मे, नंगा कर दो राज।
घेरो संसद् देश की, तभी सधेगा काज।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ जनवरी, २०२३ ईसवी।)