— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मैकश मैकदा में परीशाँ, जाम ढूँढ़ रहे हैं,
हम ज़ख़्म की ख़ातिर, आराम ढूँढ़ रहे हैं।
चेहरा-पे-चेहरे लगा, रंग बदलते हैं जनाब,
हम अधर्मियों के घर, अब ‘राम’ ढूँढ़ रहे हैं।
किस हद तक वे गिरेंगे, अन्दाज़ा भी नहीं,
हम हैवानों की बस्ती में काम ढूँढ़ रहे हैं।
आँखें बूढ़ी हो रहीं, हालात नाज़ुक हैं यहाँ,
हम भटके हैं बहुत, अब शाम ढूँढ़ रहे हैं।
दीगर पेश तस्वीर, यहाँ अपने मुल्क़ की,
हम दरो दीवार में, अपना नाम ढूँढ़ रहे हैं
कैसे बयाँ करें उनकी फ़ित्रत के हर रंग,
हम ताल्लुक़ात ख़त्म कर, धाम ढूँढ़ रहे हैं।
बेइंसाफ़ी रग-रग में, उनकी लहू में दौड़ती,
हम ख़ास शहर में, राह आम ढूँढ़ रहे हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ अक्तूबर, २०२० ईसवी)