आओ प्रिये, कार्तिकी पर हम,
देवों की दीपावली मनायें ।
सभी देवता हमें निहारे,
वे उतर धरा पर आयें ।।
मिट्टी और बिजली के दीपक,
देव देवियाँ नहीं सजाते ।
नील गगन में लटके तारे,
टिम-टिम ज्योति जगाते ।।
मेरी दीप मालिकाओं की,
झिल-मिल दीया बाती
अग्नि चर्खियाँ, फुलझड़ियाँ,
तो चकाचौंध कर जातीं ।।
रूपसि, उनके स्वागत में हम,
घी के दिये जलायेंगे ।
दीपक राग में निबद्ध फिर,
स्वागत गान सुनायेंगे ।।
नील कमल, पीले गेन्दा के,
सुन्दर हार बनाऊँगा ।
जब वे निकट हमारे आयें,
स्वागत में पहनाऊँगा ।।
विविध रंग की ‘सुरभि रंगोली’,
पाटे पर बैठ बना लो तुम ।
पेड़ा बरफी और जलेबी,
सब पकवान सजालो तुम ।।
मेरी डलिया के ऋतुफल सब,
रसमय स्वाद-भरे हैं ।
रंग बिरंगे, आकर्षक अरु,
आदर प्रेम पगे हैं ।।
पहले अर्पण करेंगे उनको,
फिर हम दोनों खायेंगे ।
वे तो खा नहीं सकते,
सो हमें देख ललचायेंगे ।।
शंकर होंगे पारबती संग,
विष्णु संग लक्ष्मी होंगी ।
अन्य देवता और देवियाँ,
युगल नृत्य में रत होंगी ।।
तुम तो मेरी ह्रदय-वल्लभा,
गीत मेरे दुहराओगी ।
देवों की दीपावली आज,
तुम मेरी सफल बनाओगी ।।
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख हिरदै,कार्तिकी पूर्णिमा,
देव- दीपावली,
गुरुनानक जयन्ती
23/11/2018