● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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होठ बुदबुदाये, कह न सका,
भाव उमड़ाये, बह न सका।
विचार फैले, चादर हो गये,
सिकोड़े थे, पर तह न सका।
बूढ़े ज़ख़्म, नासूर बन गये,
दबाया ज़रूर, सह न सका।
संदेश बहुत, राम-रहीम के,
ज़ेह्न बेचारा, गह न सका।
गन्दे नाले, फ़ितूर सब किये,
बहा तो था, पर बह न सका।
सौदेबाज़ी ख़ुद से, करता रहा,
मगर कोई हिस्सा, लह न सका।
इन्क़िलाबी तेवर, कसे थे बहुत,
मगर कोई क़िला, ढह न सका।
अजीब मोड़ पे, दिखी ज़िन्दगी,
साथ तो रहा, संग रह न सका।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जनवरी, २०२४ ईसवी।)