जाग्रत्१ आत्मबोध

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरे शहर मे,
दूधमुँहे साँपों की नस्लें
फ़न काढ़ना सीख गयी हैं।
चुगुलख़ोर हवा२ के साथ
गलबँहिया करते हुए,
नायाब प्रजाति के प्रतिकूल औलाद३
सुर-मे-सुर मिलाना सीख गये हैं।
यों तो साँपों की कई नस्लें हैं
पर दुधमुहेँ४,
ज़रूरत से ज़ियाद:/ज़ियादा५
फुँफकार मारते दिखने लगे हैं।
जी करता है,
कुचल डालूँ;
एक सिरे से गिन-गिनकर।
मेरी अन्तश्चेतना
आवाज़ देती है :–
फिर तुममे और उनमे
फ़र्क़ ही क्या रह जायेगा?
वहीं मेरे भीतर की इंसानियत
खड़ी कर देती है,
वर्जना की एक अवेध्य दीवार।
मै लौटा लाता हूँ,
सारे हिंसक विचारक्रम६ को;
एक बार फिर से
आत्ममन्थन करने के लिए।


अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्द :―

१जागृत २हवाएँ-हवाओं ३औलादें-औलादों (एकवचन के पुंल्लिंग-शब्द ‘वलद’ का बहुवचन और पुंल्लिंग-शब्द ‘औलाद’ है।) ४दूधमुहेँ-दूधमुँहे-दूधमुँहें ५ज़्यादा ६विचारक्रमों-विचार-क्रमो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ जून, २०२३ ईसवी।)