“देशभर मे शासकीय-अर्द्ध-शासकीय एवं अशासकीय कार्यालयों मे कार्यालयीय हिन्दीशब्द-प्रयोगों की दशा अति शोचनीय है। इसका मुख्य कारण है, हिन्दी-भाषा को हस्तामलक समझ लेना। यही कारण है कि उन कार्यालयों से जब कोई पत्र निर्गत होता है और बाहर से पत्र भेजा जाता है तब प्राय: देखा जाता है कि सामान्य शब्दों मे भी बड़ी संख्या मे अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्द-व्यवहार होते हैं। इसका मुख्य कारण है, सीखने के स्वभाव का विकास न हो पाना।”
उपर्युक्त उद्गार भाषाविज्ञानी एवं समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के हैं, जिन्हें उन्होंने आकाशवाणी, इलाहाबाद की ओर से ४ जुलाई को आकाशवाणी-सभागार मे आयोजित ‘कार्यालयीय हिन्दीभाषा-प्रयोग एवं दोष-निवारण’-विषयक कार्यशाला मे मुख्य अतिथि और मार्गदर्शक के रूप मे व्यक्त किये थे।

उन्होंने अपने विचारों को गति देते हुए, आगे बताया, ‘हमने यही देखा और समझा है कि जब ऐसी कार्यशाला-आयोजन के लिए जब शासकीय आदेश प्रेषित किये जाते हैं तभी ‘हिन्दीप्रयोग के प्रति सजगता’ की बात आती है, अन्यथा कर्मचारियों का अपनी उस हिन्दीभाषा के प्रति अनुराग नहीं दिखता, जिसके कारण वह अपना और अपने परिवार का जीविकोपार्जन करता है। कम-से-कम यही सोचकर शुद्ध और उपयुक्त कार्यालयीय हिन्दी-शब्दों को ग्रहण करने के प्रति आग्रहशीलता दिखनी चाहिए।”
आचार्य पाण्डेय ने कहा, “आप जब अपने कार्यक्रम-प्रसारण के संदर्भ मे मौखिक और लिखित भाषाओं का प्रयोग कर रहे होते हैं तब आपको वाक्यविन्यास की शुद्धता के प्रति सजग रहना होगा। प्राय: देखा गया है कि उच्चारण करते समय सम्बन्धित कार्यक्रम-अधिकारी, उद्घोषक, वार्त्ताकार, कवि-कवयित्री, नाटक के लेखक, पात्र आदिक श, ष तथा स के उच्चारण मे अन्तर नहीं कर पाते।
आरम्भ मे, स्वागत-भाषण करते हुए, आकाशवाणी के निदेशक डॉ० लोकेश शुक्ल ने कहा, “यह हमारे लिए सौभाग्य का विषय है कि देश के जाने-माने भाषाविद् आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारे बीच हैं और जिनसे हम लोग कार्यालयीय हिन्दीशब्द-प्रयोग की बारीकियों को शुद्धता के साथ सीखेंगे।” राजभाषा-अधिकारी राजेश जायसवाल ने मुख्य अतिथि का परिचय प्रस्तुत किया।
उस अवसर पर आचार्य ने व और ब, लिये और लिए, बहुत और बड़ा, हुए और हुये, चाहिए और चाहिये, महोदय!-महोदय, सेवा मे-सेवा मे, पूर्वग्रह और पूर्वाग्रह, उपयुक्त और उपरोक्त, अधीन और आधीन, अन्तर्राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय, आरोपी और आरोपित, आद्यन्त और आद्यान्त, आद्योपान्त और अद्योपान्त, अधिकतर-अधिकांश, श्रीमती-श्रीमति, सर्जन और सृजन, शाइर और शायर, हवा और हवाओं, जाग्रत् और जागृत, अनुगृहीत और अनुग्रहित- अनुग्रहीत, जन्मदिनांक और जन्मदिन, जन्मतिथि और जन्मजयन्ती, जयन्ती और जयंती समारोह, हँसना और हंसना, सहस्र और सहस्त्र, स्रोत और स्तोत्र-स्त्रोत, कोश और कोष, आरम्भ-प्रारम्भ- समारम्भ, प्रवास, अप्रवास, आप्रवास, अनिवास आवास तथा निवास, अनुवाद और रूपान्तर, विद्वान् और विदुषी, जिजीविषा-जिगीषा, समय और अवधि, कवयित्री-कवियित्री, नेत्री-महिला नेता, हिन्दी-अनुभाग और हिन्दी अनुभाग, प्रस्तुति करना और प्रस्तुति देना, प्रस्तुतीकरण और प्रस्तुतिकरण, तत्त्व-तत्व, महत्त्व-महत्व, धराशायी- धराशाही-धाराशायी-धाराशाही, प्रवहमान-प्रवाहमान, शत-शत और शत्-शत् हस्तक्षेप-हस्ताक्षेप, मिष्टान्न-मिष्ठान्न, शुश्रूषा-सुश्रूषा, बृहद्-वृहद, एलान-ऐलान, जब-तब, यदि-तो, भले-फिर भी, यद्यपि-तथापि, व-और-एवं-तथा, या-वा-अथवा, बीभत्स-वीभत्स, समुद्र-समन्दर, अनेक-अनेकों, के गणनानुसार-की गणनानुसार, राशि-राशियों, अभिवादन-अभिवादन करता हूँ, धन्यवाद- आभार-साधुवाद-शुक्रिय:-शुक्रिया, कृपया-कृप्या, भारी बहुमत-बहुमत, गो-गौ, भाइयों-भाईयों, हलका-हल्का, पाठ्येतर-पाठ्येत्तर, साहित्येतर-साहित्येत्तर, बढ़ोतरी-बढ़ोत्तरी, बेहतर-बहुत बेहतर, बेहतरीन-सबसे बेहतरीन, श्रेष्ठ-सर्वश्रेष्ठ आदिक शताधिक शब्दों मे से कौन शुद्ध हैं और कौन अशुद्ध, उन्हें सकारण और सोदाहरण लिखकर समझाया।
उन्होंने विराम और विरामेतर चिह्नो के अन्तर्गत ‘अल्प, अर्द्ध, पूर्ण, प्रश्न, विस्मयादि, सम्बोधन, एकल-युगल उद्धरणचिह्न, उपविरामचिह्न, योजक-विवरणचिह्न इत्यादिक चिह्नो के प्रयोग और उपयोगिता को समझाया।
उन्होंने अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पश्तो आदिक भाषाओं के उन शब्दों के शुद्ध रूप को बताया, जिनके अशुद्ध रूप को बिना विचार किये मीडिया-जगत् ग्रहण करता आ रहा है और समाज को विषाक्त भी। उन्होंने उच्चारण करते और लिखते समय नुक़्ता के महत्त्व को समझाया। ज़रूरत, ज़ंग, ज़न, हक़ीक़त, ग़म, जोख़िम, क़लम, फ़रमाईश, हुक़्म, हक़, ज़ोरदार, ज़ख़्म, ज़ह्र, ज़ह्न आदिक शब्दों के शुद्ध उच्चारण करते और लिखते हुए समझाया। उन्होंने संख्यात्मक शब्दों का शुद्ध उच्चारण और लेखन करना सिखाया। इक्कीस-एकइस-इकीस, बाईस-बाइस, तेईस-तेइस, उनतीस-उन्तीस, उनसठ-उन्सठ, पच्चासी-पिचासी, नब्वे-नब्बे, पंचानवे-पिंचानबे आदिक संख्यात्मक शब्दों मे कौन शुद्ध और कौन अशुद्ध है, इसे समझाया।
आलेखन/प्रारूपण मे किस शब्द को कैसे प्रस्तुत करना चाहिए; अनुवाद करते समय किन-किन नियमो को धारण करना चाहिए; संक्षिप्त लेखन की अवधारणा को समझाते हुए, लेखन कैसे करना चाहिए, इसे भी समझाया।
निदेशक, अभियान्त्रिकी देवेशकुमार श्रीवास्तव ने कृतज्ञता-ज्ञापन किया था।