जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद)
मञ्च नहीं तो रञ्च नहीं है, संग मातु ग़र हिन्दी है।

पुण्यप्रसूना विलसित दूना , भाषाओं की बिन्दी है।।
मञ्च नहीं तो रञ्च…………………….. ………।।१।।
शुभ्र धवलता अतुलित ममता, समता और सुनीता है।
भाग्य प्रवर्द्धिनी, कीर्तिवर्द्धिनी,प्रचलित और पुनीता है।।
शान्तिशालिनी, कान्तिमालिनी, निश्छल और कल्याणी है।
वक्षधवलिनी, नेह तरंगिणी, प्रमुदिता और तारिणी है।।
तिक्त हृदय में प्रेम प्रवाहित, करती शिव की ये नन्दी है।।
मञ्च नहीं तो रञ्च…………………….. …………..।।२।।
राष्ट्रप्रेम के भाव जागरित करने वाली ये पुण्य प्रतीता है।
कर्मयोग के तत्त्व सिखाती नित अविरल बहती गीता है।।
सत्य, अहिंसा और मीमांसा की यह परम सत्य संहिता है।
अगणित कष्टों के सम्मुख भी मन हरषाने वाली सीता है।।
जिसका मन सिक्त नहीं,उसकी बुद्धि दुर्बुद्धि की बन्दी है।।
मञ्च नहीं तो रञ्च…………………….. …………..।।३।।