दुनिया से जाने के बाद

प्रभांशु कुमार, इलाहाबाद    


दुनिया से जाने के बाद
रह जाना चाहता हूं
दीवार पर टंग जाने के बजाए
किसी के लिए
किसी अच्छे दिन की
अविस्मरणीय स्मृति बनकर
रह जाना चाहता हूं
धरती की कोख में
पानी की आखिरी बूंद बनकर
हजारो सालों से अनाचार
सहती पृथ्वी में
यदि बचा रह जायें
कोई पेड़
तो उस पेड का
आखिरी फूल बनकर
रह जाना चाहता हूं
मैं रहना चाहता हूं
मिञ कवियों की डायरी के
किसी कोने में
अधूरी कविता बहाने
पलटे जायें डायरी के पन्ने
बनकर रहना चाहता हूं
किसी के पेन की स्याही
कि लिखा जा सके
कुछ संस्कृति का कोई अध्याय
कोई दस्तावेज
अपनी कविता का कोई अंश बनकर
रह जाना चाहता हूं
पाठकों की स्मृति में
इस दुनिया से जाने के बाद
रहना चाहता हूं
किसी व्यकित की
ईमानदारी,संघषशीलता में
दुनिया की बेहतरी के
देखे जाने वाले
किसी व्यकित के स्वप्न में
इस दुनिया से
जाने के बाद
रहना चाहता हूं
किसी मजदूर के हाथों का
खुदरापन बनकर
किसी किसान का हल बनकर
कुम्हार के चाक में
लोहा बनकर
चरवाहे का गीत बनकर
रह जाना चाहता हूं।।