एक अभिव्यक्ति—-

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-

कविता मेरी ठिठुर रही है, निष्ठुर ठण्डी आहों से।

डरता हूँ वो बिछुड़ न जाए, प्रेम भरी इन राहों से।।
घुटन नहीं ये प्रेम है मेरा, जानो कितना विवश हूँ मैं,
जैसे तैसे बाँध रखा हूँ, अपने प्रेमपाश में बाँहों से।
मुझ पे जरा भरोसा कर लो, छटेंगे फिर काले बादल,
कितनी बार राह सुझाया, जीवन के जटिल दुराहों से।
प्रेम नहीं ये छिछला अपना, ये ईश इबादत के जैसा,
प्रेमी कभी पथ नहीं बदलते, कुण्ठित मन की वाहों से।
मन में अपने भ्रम न पालो, चाहत के अफसानों पे,
विरक्त हृदय में प्रेम जगा दें, अपने स्नेहिल चाहों से।