
डॉ० दिवाकर दत्त त्रिपाठ (चिकित्सक/युवा गीतकार)-
कभी कभी इस उर की पीड़ा, पतझड़ जैसी हो जाती है ।
रंग बिरंगी दुनिया , यह जब सेमल फूल सरीखी लगती ।
कोयल की वह कूक कर्णप्रिय, कानो को तब तीखी लगती ।
सारे सपने गिर जाते हैं , पत्तों जैसे पीले होकर ।
मन एकाकी हो जाता है , कढ़वी मीठी यादें खोकर ।
मन के सारे चित्र सुनहरे ,धार नयन की धो जाती है ।
कभी-कभी……………………………………….
गर्म हवा का धूलि धूसरित, मन में इक गुबार उठता है ।
दर्द भरा इक चक्रवात, यादों में बार बार उठता है ।
कर्कश ध्वनि सूखे पत्तों की, मन में भय सा भर देती है ।
ठूँठ हुए पेड़ों की पीड़ा, तन को बूढ़ा कर देती है ।
शाम ढले पपिहा की पीड़ा, बीज दर्द का बो जाती है ।
कभी……………………………………………