आओ! घमण्ड के भाव का परित्याग करें


आओ हम एक दूसरे के घर को 
खुशियों से भर दें।
एक-दूसरे का साथ देकर,
एक-दूसरे के जीवन को 
आसान बना दें।
आओ! हम एक-दूसरे के 
सुख–दु:ख के साथी बने।

हम सब जन्म से पूर्व
इस धरती पर 
कुछ लेकर नहीं आए थे।
हम सबको कुछ न कुछ,
एक-दूसरे से इसी जग में मिला।
हमारी सफलताओं में है 
सभी का योगदान,
सब कुछ है हमारा
हम क्यों अहंकार में जीते हैं?
आओ! घमंड के भाव का परित्याग करें।

हमारे संस्कारों में यह नहीं था,
हम अपनो से 
दुर्व्यवहार क्यों कर रहे हैं?
चंद रुपयों के लिए 
जन्मों के रिश्तों को 
क्यों तोड़ रहे हैं?
हम अपनी 
आने वाली पीढ़ियों को 
क्या सीख देंगे ?
आओ! हम बुराइयों को 
अपनी अच्छाइयों से 
दूर कर दें।

एक-दूसरे के हृदय मे 
एक-दूसरे के प्रति 
अगाध प्रेम हो।
हम जब भी 
मिलें एक-दूसरे से 
हँसकर मिलें।
हममे सौहार्द हो 
चारों ओर चेतना हो
प्रकाश हो।
आओ! हम सब मिलकर 
एक दूसरे के संग 
अपनी जिंदगी को जी लें।

चेतना चितेरी , प्रयागराज उत्तर प्रदेश