मेरे भाई बहुत दूर चला गया हूँ मै मेरी माँ से तू मेरा एक काम करना ,
उठना सुबह और रोज मेरी माँ भारती और तिरंगे को सलाम करना,
कितना खुश नसीब था मैं माँ भारती की गोद में सदा के लिए सो गया,
जन्म देने वाली माँ से मिल न पाया कदमो की धूल उसने मेरे नाम करना,
नहीं कहूंगा कि औरों की तरह तू भी मेरे लिए नारे लगा दीपक जला गलीयो मे,
अमर हुआ हैं भाई तेरा फक्र से जीना और खुद का सम्मान करना,
जाना कहीं मत फूल चढ़ाने या मातम माने जाने के गम में इस सपूत के,
देना चाहे जो श्रद्धांजलि मुझे तो मेरे दुश्मनों का कटा सर मेरे नाम करना,
उसी माँ के बेटा है तू भी जिसका था मैं तू लड़ना अंतिम सांस तक,
मर जाना या मार जाना पर मेरी शहादत को कायर बन के न बदनाम करना,
जाना दिल में भर के आज वो जो दुश्मनों को कर सके विनाश,
पर डर लगे जो गोलियों से तो छिप जाना महबूब के आँचल में मेरी माँ को न तू प्रणाम करना,
जन्म लूंगा फिर से मैं मेरी माँ भारती की कोख से आउंगा फिर से सोने के लिए उसकी गोद में,
नहीं चाहिए मुझे तेरे से कुछ और बस मेरे आने तक न तू मेरी माँ का अपमान करना,
बहुत दूर चला गया हूँ मेरी माँ से मेरे भाई तू मेरा एक काम करना ,
उठना सुबह और रोज मेरी माँ भारती और तिरंगे को सलाम करना,
कवि – सितांशु त्रिपाठी,
जिला – सतना, मध्यप्रदेश