हे हरि ! तेरे साथ सदा मेरा विरोध

आकांक्षा मिश्रा, गोंडा उत्तर- प्रदेश


तेरे साथ सदा मेरा विरोध ,अब मुझे
सहा जाता नहीं ।

दिन प्रतिदिन तूने मुझ पर ऋण का भार ,रहें बढ़ाते
इस आभार भरे शब्दों से सदा सिमटी सी
कोने की पंक्ति में खड़ी रही ।

जब देखा तेरे सभा मंच पर मंडित सुंदर विद्जन
कई -कई ग्रंथों को लेकर आए
तुझे अभिवादन कर तुझसे लिपट -लिपट कर चले गए तेरे सदन द्वार पर ।

मेरा मन सिमट गया मैं बन न सकी सभा मंच की सदस्य;
मैं बाहर ही बाहर रही सदा निज तेरे निकट !!!

इस मन की वेदना किस शब्दों में तुझसे कहूं
तू रहा नहीं अब जब मेरे समीप ।

तुझसे अपनी वेदना कहने का साहस ना कर पाई
इस अपमान से भरी मैं सभा मंच की सदस्य न बन पाई

बस यही रही अब मेरी चाह जुड़ी रहे सदा तेरी चाह में मेरी चाह
तेरे साथ सदा मेरा विरोध अब मुझसे सहा जाता नहीं ।