कड़वा घूंट

आकांक्षा मिश्रा-


किसी पुरुष के सानिध्य में रहकर, स्त्री वाद की बात करे
तो पूरी तरह से छिछलापन हैं
कुरूपता लिए बेगढ़न्त बातें उतरती नहीं
कड़वे घूंट की तरह
पूजती हैं पत्थरों में अमरसुहाग के लिए
ये पहले देवता बनते हैं
फिर धीरे -धीरे परिवर्तित होकर दानव बनते है
उच्च कोटि की स्त्री के दृष्टिकोण में
निहायत किस्म का ये मूल्यांकन है
मनुष्य सिर्फ कुछ चीजों में देवता है
स्त्री तुम अधीन होकर राग भरती हो
ये प्रवंचना का परिवर्तित रूप हैं किसी पुरुष के सानिध्य में रहकर, स्त्री वाद की बात करे
तो पूरी तरह से छिछलापन हैं
कुरूपता लिए बेगढ़न्त बातें उतरती नहीं
कड़वे घूंट की तरह
पूजती हैं पत्थरों में अमरसुहाग के लिए
ये पहले देवता बनते हैं
फिर धीरे -धीरे परिवर्तित होकर दानव बनते है
उच्च कोटि की स्त्री के दृष्टिकोण में
निहायत किस्म का ये मूल्यांकन है
मनुष्य सिर्फ कुछ चीजों में देवता है
स्त्री तुम अधीन होकर राग भरती हो
ये प्रवंचना का परिवर्तित रूप हैं ।