मां सर्वोपरि

सुधीर अवस्थी परदेशी

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’

मां लिखूं तेरे बारे में क्या, वाक्य बनते हैं नहीं।
गद्य-पद्य कहूं क्या मैं, आंसू थमते हैं नहीं।।
प्रेम तेरा प्यारा इतना, तुमसा नहिं कोई और है।
हूं अंधेरी रात मैया, तू उजाला भोर है।।
बोलना तूने सिखाया, उंगली पकड़ दौड़ा दिया।
मांस का था लोथड़ा, मानव मुझे कहला दिया।।
फर्ज सारे निभाए तूने, बारी मेरी आ गई।
हो गया मजबूर मैया, जिन्दगी पछता गई।।
पैसे-पद की चाह में, मां से मेरी दूरी हुई।
सेवा न मां की कर सका, अपनी मजबूरी हुई।।
फिर भी खुश है अपनी मां, जो हित पराया चाहती।
आबाद हो खुशहाल हो, बेटे की मन्नत मांगती।।
बीबी-बच्चों और दोस्ती, रिश्तों से बड़ा जो नाता है।
परदेशी वह कोई और नहीं, मम्मी, अम्मा विधाता है।

रचयिता- सुधीर अवस्थी परदेशी कवि, लेखक एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ, पत्रकार हिन्दुस्तान बघौली, हरदोई जिला प्रभारी हरदोई – भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ संचालक- सहज/सीएमएस जनसेवा केन्द्र कार्यकर्ता- हमारा पम्प बघौली, अमित माधौगंज प्रताप नगर मार्ग बघौली-हरदोई कार्यालय- लखनऊ-हरदोई मार्ग टावर प्लाट सुन्नी निकट बघौली चैराहा रचना समय- 03ः37 सायं, दिनांक-14मई2018 रचना स्थान-हमारा पम्प बघौली ।