विष बोते हैं देश मे, बोल घृणा के बोल

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
यहाँ दिख रहे साधु-सा, वहाँ दिखें शैतान।
देखो! नज़र बदल रहे, रह-रहकर हैवान।।
दो–
सब अपने को ही मिले, अजब-ग़ज़ब यह चाह।
देखो! लोग बिलख रहे, अन्धी दिखती राह।।
तीन–
विष बोते हैं देश मे, बोल घृणा के बोल।
देखो! ज़ाहिर हो रहे, मानो फटहे ढोल।।
चार–
गद्दी ही प्यारी लगे, देश-धर्म ले आड़।
देखो! कैसे कर रहे, संविधान की फाड़।।
पाँच–
बोल भरा है आग से, विष की मानो खान।
देखो! कितने हीन हैं, कलुषित करते मान।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० मई, २०२३ ईसवी।)