मैं चेतना हूंँ

मैं सोचती हूंँ ,
जन्मतिथि पर तुम्हें क्या उपहार दूंँ ,
तुम स्वयं में चेतना हो।

जीवन जीने की कला है तुममें,
तुम्हें क्या सीख दूँ ,
तुम स्वयं में प्रज्ञा हो।

नित नवीन सद्विचार लाती हो ,
तुम्हें क्या उपदेश दूँ ,
तुम स्वयं में ज्ञानवती हो।

जन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ देती हो,
तुम्हें क्या याद दिलाऊँ,
तुम स्वयं में सुधि प्रकाश हो।

मैं तुम्हें ह्रदय से पुकारती हूंँ ,
सुनो चेतना! मेरी अंतरात्मा की आवाज ,

इस दिवस उर-मस्तिष्क की बधाई स्वीकार करो ,
स्वयं के साथ-साथ औरों का उद्धार करो।

–चेतना प्रकाश चितेरी, प्रयागराज , उत्तर प्रदेश