जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद)

तू मुझसे प्रेम करता है ,या रक्तिम आँसू रुलाता है,
कभी अग्नि से जलाता है,कभी तेज़ाब से झुलसाता है।
अरे! मानव अहंकारी दुर्बुद्धिकारी, सद्बुद्धि पैदा कर,
जो ही तुझको करे पैदा, तू उसका अस्तित्व झुठलाता है।
प्रलय आया जायेगी सारी, धरा पर सोचकर जरा देखो!
तू नर हो कर अरे! दम्भी, नारायणी को सताता है।
जटा में शिव के बसी गङ्गा, तुम चरणों में बिठाते हो,
तू करता भ्रूण की हत्या, फ़िर जा के गङ्गा नहाता है।
तू क्या जाने उमा, रमा, ब्रह्मणी की गरिमामयी गाथा,
तू बस आवेश में आ के, अपनी ही गरिमा गिराता है।