राम! उत्तर दो

★आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

राम!
तुम पैदा क्यों हुए?
तुम तो क्रय-विक्रय के लिए
मात्र एक वस्तु-सदृश हो चुके हो।
तुम एक ऐसा विज्ञापन हो,
जिसे सीने पर साटकर उन्मादी भीड़
हिंसा का जुलूस निकाल रही है।
तुम्हारे नाम के रहस्य से वंचित लोग
तुम्हारा नाम ले-लेकर
रक्तरंजित हो रहे हैं; रक्तरंजित कर रहे हैं।
भूल जाते हैं– भारतमाता की संतान हम हैं और वे भी।
तुम तो चरित्ररहित राजनीति की कोख से निकले ‘राम’ हो;
तुम सियाविहीन ‘जय श्री राम’ हो।
तुम ओजविहीन, समताघातक निर्मूल राम हो।
तुम्हारा अस्तित्व क्षणभंगुर है।
तुम अपनी महत्ता विस्मृत कर चुके हो।
जब-जब जिह्वा पर तुम्हारा नाम आता है।
नागफनी का अनुभव हर बार करा जाते हो।
तुम छलते हो या फिर तुम छले जाते हो?
शोधार्थी मौन के कटघरे में ला खड़े किये गये हैं।
तात्त्विक-पुरातात्त्विक चिन्तन
अप्रासंगिक लक्षित होते जा रहे हैं।
तुम स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हो
और मर्यादा का शीलहरण भी कराते हो?
तुम्हारे नाम से ‘हिंसा’ की दुर्गन्ध उठती है
तुम्हारे नाम से विध्वंस की ध्वनि निर्गत होती है।
तुम वह राम नहीं, जो समदर्शी है; नायक है
तुम वह राम नहीं, जिसने श्रद्धा और विश्वास की प्रतिष्ठा की थी।
तुम वह राम नहीं, जहाँ “प्राण जाय पर बचन न जाये” का ध्वज आज भी गर्व के साथ लहरा रहा है;
तुम तो वचनघातियों के सहोदर भ्राता-सदृश प्रतीत होते हो।
तुम तो समाज को गर्त मे ले जानेवाले अधिनायक हो।
तुम्हारे नाम का ‘रा’
‘रावणी प्रवृत्ति’ का अभिज्ञान कराता है
और ‘म’
‘मरघट’ की ओर घसीटता प्रतीत होता है।
“मरा-मरा” भजनेवाला ‘राममय’ हो गया
और “राम-राम” जपनेवाला मरणासन्न!
है न विरोधाभास?
दोष तुम्हारे शिथिल चरित्र का है;
क्योंकि तुम ‘राम’ नहीं हो।
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(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)