शब्दशक्ति

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

शब्द की उष्मा;
शब्द की कान्ति;
शब्द की संगति;
शब्द की ऊर्जा;
सार्थक तभी होती है
जब शब्दकार
साधक होता है।
शब्द सात्त्विक होता है,
अहम् और त्वम् नहीं;
सम्प्रदाय और जाति नहीं;
रहित और विपन्न नहीं।
शब्दों के बीज फेंककर
विभाजन की लकीर खींचनेवाले;
निर्दोष धरती की कोख मे
विषाक्त बीज-वपन करनेवाले;
निर्धन और दलित की खेती करनेवाले;
अवर्ण और सवर्ण का हल चलानेवाले;
अन्तत:, गर्हित मानसिकता के साथ
अपने विफल होते जीवन की
पटकथा लिखते हैं
और हर शब्द को
अपने विकृत खाँचे मे
समायोजित करने का
कुत्सित प्रयास करते हैं।
शब्दशक्ति
अभिधा-रूप मे आक्रामक हो जाती है।
शब्दशक्ति
लक्षणा-रूप मे
चक्करघिन्नी-भाँति नचाती रहती है।
शब्दशक्ति
व्यंजना-रूप मे न जीने देती है और न मरने।
शब्द का अन्यथा प्रयोग
कोरोना से भी घातक है।
कोरोना मार डालेगा
मगर शब्द तड़पायेगा।
तड़पायेगा… और तड़पायेगा
और कर देगा संज्ञाशून्य।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)