●आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति।
मन्दिर मे मूरत दिखे, उड़न-छू हुई शक्ति।।
दो–
पट्टी बाँधे आँख मे, देश जगाता चोर।
भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब शोर।।
तीन–
अजब-ग़ज़ब के लोग हैं, शर्म-हया से दूर।
सेंध लगी है देश मे, लोग बने हैं सूर।।
चार–
लोकतन्त्र गूँगा बना, ‘अच्छे दिन’ की मौत।
न्याय-देवता कह रहे, लाओ! घर में सौत।।
पाँच–
दुनिया है उम्मीद पे, कहते ‘पृथ्वीनाथ’।
अन्धेरे को चीर कर, दीप बढ़ाओ हाथ।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)