चुप्पी अब तो व्यर्थ है, लेती है आकार

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मन का प्यासा दूर है, तन का प्यासा पास।
मृगमरीचिका ही दिखे, थोथी होती आस।।
दो–
रूप रूपसी रुत नहीं, रंग नूर अवसान।
पलक झपकती आँख है, मची है घमासान।।
तीन–
गणित बदलता धूप का, जलती रहती देह।
हवा मनचली मौन है, कहाँ ठौर है गेह।।
चार–
मनका मनका मूक है, भीतर हाहाकार।
चुप्पी अब तो व्यर्थ है, लेती है आकार।।
पाँच–
रिसती है संवेदना, सरोकार है रिक्त।
मधुर मान घटता दिखे, स्वजन भाव है तिक्त।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)