हरजाई बन रहे रिश्ते आँखों के सामने

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

उठ रही है हर लहर आँखों के सामने ,
गिर रही है हर लहर आँखों के सामने।
बेहयाई कर रही हक़ीक़त-अफ़्ज़ाइश,
गिर रही है हर हया आँखों के सामने।
ज़माने की दुश्वारी से भला कौन है बचा,
ख़ूँ के आँसू रुला रही आँखों के सामने।
इंसानियत का ख़ूँ पतला दिख रहा यहाँ,
हरजाई बन रहे रिश्ते आँखों के सामने।
आओ! अब इस सवाल पर गौर करें हम,
कब-कहाँ-कैसे चूक हुई आँखों के सामने।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ अगस्त, २०२० ईसवी।)