ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

उत्तरप्रदेश के ज़िला-पंचायत-चुनावों में ‘साइकिल’ ने सभी को पीछे छोड़ा

  ★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

     जिस भारतीय जनता पार्टी का समूचे उत्तरप्रदेश में राजनैतिक वर्चस्व रहा, अब वह ध्वस्त होती दिख रही है। इसे हाल ही में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के ज़िलापंचायत-चुनावों के परिणामों ने उजागर कर दिये हैं। कुल ३,०५० स्थानों के लिए चुनाव कराये गये थे, जिनमें से सर्वाधिक सीटें (१,२६६) निर्दलीय और अन्य दलीय प्रत्याशियों के अधिकारक्षेत्र में आयी हैं और मुँह के बल भारतीय जनता पार्टी गिर चुकी है। इस समय भारतीय जनता पार्टी दूसरे स्थान (५८०) पर है। उससे बुरी तरह से ध्वस्त करते हुए, समाजवादी पार्टी शीर्ष (७८२) पर पहुँच चुकी है। भारतीय जनता पार्टी की उत्तरप्रदेश में अपनी सरकार है और उसके पास अपने अधिकारों और सुविधा-संसाधनों के दुरुपयोग करने के लिए पर्याप्त शक्ति है, जिनका वह अपने गठन के समय से ही दुरुपयोग करती आ रही है। इस बात से भी इंकार नहीं किया सकता कि इस राज्य के ज़िला-पंचायत-चुनावों में इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जिस  तन्मयता और राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ एक कुशल रणनीति के अन्तर्गत अपने प्रत्याशियों के चयन करने में अपनी रुचि प्रदर्शित की थी, उससे सिद्ध हो गया था कि भारतीय जनता पार्टी-समर्थित प्रत्याशी बेहतर प्रदर्शन करेंगे; किन्तु जब परिणाम आने लगे तब यह सुस्पष्ट होने लगा था कि इस बार का पंचायत-चुनाव हस्तामलक नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे० पी० नड्डा ने मतदान से पूर्व उत्तरप्रदेश में जिस प्रकार का अभियान संचालित किया था, उससे यह लगने लगा था कि वर्तमान पंचायत-चुनाव वर्ष २०२२ में होनेवाले उत्तरप्रदेश-विधानसभा के लिए सेमी फ़ाइनल का मुक़ाबला है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी को धूल चटानेवाले समाजवादी दल ने इस चुनाव को उतनी गम्भीरता से नहीं लिया था जितनी कि उसे लेनी चाहिए थी। वहीं तीसरे स्थान पर आनेवाली बहुजन समाज पार्टी ने भी बहुत गम्भीरता नहीं बरती थी; क्योंकि मायावती का अभियान दिखा नहीं। इनसे सुस्पष्ट हो जाता है कि भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध राज्य की सामान्य जनता आक्रोशित है, जिसके मूल में कई तथ्य उभरते दिख रहे हैं। जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और प्रभावमय तथ्य है, वह यह है कि भारतीय जनता पार्टी-गठित सरकार का नेतृत्व निरंकुश दिख रहा है; अपराध, रिश्वतख़ोरी, गुण्डागर्दी, अशिक्षा, कुपोषण तथा महँगाई चरम पर हैं, जिन्हें समाप्त करने अथवा नियन्त्रित करने में वर्तमान योगी आदित्यनाथ की सरकार पूरी तरह से असफल सिद्ध हो चुकी है। इस सरकार ने जिस-जिस स्थान का नाम बदलते हुए, अपनी गर्हित हिन्दुत्ववादी की स्थापना करने की कोशिश की है, उन सभी  ज़िलों ने योगी को इस चुनाव में डुबो दिया है। कतिपय ज़िलों को छोड़ दें तो शेष ज़िलों में भारतीय जनता पार्टी-समर्थित प्रत्याशियों को समाजवादी पार्टी-समर्थित प्रत्याशियों ने धूल की तरह से इस तरह से उड़ा दिये हैं कि जिन्हें देख-समझकर हैरत होती है। जिस तरह से बंगाल के विधानसभाई चुनाव में नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, जे० पी० नड्डा, विजयवर्गीय आदिक प्रमुख नेताओं ने 'दो सौ प्लस' सीटें जीतने की घोषणा कर दी थी और परिणाम में ७७ सीटें मिली थीं, उसी तरह से ज़िलों के पंचायती-चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं ने 'नौ सौ प्लस' सीटें जीतने का दावा किया था; परन्तु चुनाव-परिणामों के आधार पर वह दूसरे स्थान पर खिसक चुकी है। 

      महीनों से अनवरत किये जा रहे किसान-आन्दोलनों की अनदेखी का प्रभाव भी इन चुनावों के परिणामों में स्पष्टत: देखा जा सकता है। इतना ही नहीं, 'कोरोना-संक्रमण' से प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में उत्तरप्रदेश की जनता का मारा जाना, उत्तरप्रदेश-शासन की अकर्मण्यता और निष्क्रियता को रेखांकित करता है।

      भारतीय जनता पार्टी के लिए इससे अधिक शोचनीय स्थिति और क्या हो सकती है कि 'न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार' नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में इस चुनाव में मुँह की खानी पड़ी है। वाराणसी में भारतीय जनता पार्टी-समर्थित ७ प्रत्याशी विजयी हुए हैं, जबकि समाजवादी पार्टी-समर्थित १५ प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई है।

     पश्चिमी उत्तरप्रदेश में कुल ९०८ सीटें हैं, जिनमें से निर्दलीय ३३१, भारतीय जनता पार्टी २१९, समाजवादी पार्टी २११, बहुजन समाज पार्टी १२९ तथा काँग्रेस को १९ सीटें मिली हैं।  बुन्देलखण्ड में निर्दलीय ४८, भा० ज० पा० ३७, स० पा० ३१, ब० स० पा० ३० तथा काँग्रेस पार्टी ने २ सीटों पर जीत हासिल कर ली हैं। अवध में समाजवादी पार्टी ने २८६, भारतीय जनता पार्टी ने १६६  बहुजन समाज पार्टी ने ८९, काँग्रेस ने १५ तथा अन्य ने ३७३ सीटें जीती हैं।

      पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी ने २५२, भारतीय जनता पार्टी ने १६५, बहुजन समाज पार्टी ने १००, काँग्रेस ने २५ तथा निर्दलीय और अन्य दल-समर्थित प्रत्याशियों ने ५२३ सीटें जीत ली हैं। यहाँ भारतीय जनता पार्टी की क़रारी हार हो चुकी है। जिस 'जय श्री राम की घोषणा कर, भारतीय जनता पार्टी के नेतागण वर्षों से देश की जनता को मूर्ख बनाते आ रहे हैं, उनकी हिन्दुत्व की दाल अब गलती नहीं दिख रही है। उसे देश की जनता ने बंगाल, केरल तथा तमिलनाडु के विधानसभाई चुनावों में अच्छी तरह से देख लिया है। इतना ही नहीं, वर्तमान ज़िला-पंचायत- चुनावों में भी 'राममन्दिर-निर्माण' भी साथ देने से रहा है। यही कारण है कि उसे अयोध्या में मात्र ६ सीटें मिल पायी हैं। इलाहाबाद का प्रयागराज नामकरण करने और वहाँ से अपनी धार्मिकता चमकानेवाले योगी आदित्यनाथ को निराशा मिली है; क्योंकि प्रयागराज में भारतीय जनता पार्टी-समर्थित प्रत्याशियों ने मात्र १४ सीटें जीत पायी हैं, जबकि समाजवादी-समर्थित प्रत्याशियों ने २७ सीटों पर अपने अधिकार कर लिये हैं। आदित्यनाथ के प्रमुख क्षेत्र गोरखपुर में भारतीय जनता पार्टी २० सीटें पायी हैं, जबकि समाजवादी पार्टी ने १९ सीटें जीतकर अपना दावा प्रबलतर सिद्ध कर दिखाया है। इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी ने लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी को १०-३ और कानपुर नगर में ११-८ से पराजित कर, अपना वर्चस्व सार्वजनिक कर दिखाया है। 

    बहुजन समाज पार्टी का आगरा में वर्चस्व लम्बे समय से रहा है, जिसे वह अभी तक बनाये हुए है। यही कारण है कि ज़िला-पंचायत- चुनावों में सर्वाधिक १७ सीटें जीतकर, वह अपना दबदबा बनाये हुए है। ऐसा नहीं कि समाजवादी पार्टी को क्षति नहीं पहुँची है। उसके भी कई प्रमुख नेता पराजित हुए हैं। सैफई में स० पा० के प्रमुख नेता तक पराजित हुए हैं; लेकिन आगे चलकर उसने भरपाई कर ली है।
 
     उल्लेखनीय है कि भारतीय जनता पार्टी ने उस समय चुनाव कराये थे जिस समय लोग कोरोना के प्रभाव से बुरी तरह से मर रहे थे और अब भी मर रहे हैं। काँग्रेस केवल अपने नाम को लेकर घिसट रही है; अब वह मरणासन्न स्थिति में आ चुकी है। बहुजन समाज पार्टी को भारतीय जनता पार्टी के साये के रूप में देखा जा सकता है; क्योंकि मायावती को मालूम है कि भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर न काम करने से उनके लिए जेल के दरवाज़े खुल जायेंगे। भारतीय जनता पार्टी के पास मायावती के कुकृत्यों से भरा घड़ा सुरक्षित है, जिन पर 'न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार' का संकेत होते ही सी० बी० आइ०, ई० डी०, एन० आइ० ए०, न्यायपालिका आदिक की क्रूर दृष्टि पड़ जायेगी।
 
      विभिन्न राजनैतिक दलों-द्वारा समर्थित प्रत्याशियों की वर्तमान स्थिति इस प्रकार है :--
 ● समाजवादी पार्टी-- ७८२ सीटें।
 ● भारतीय जनता पार्टी-- ५८० सीटें।
 ● बहुजन समाज पार्टी-- ३६१ सीटें।
 ● काँग्रेस पार्टी-- ६१ सीटें।
 ● निर्दलीय-- १,२६६ सीटें।

   इसमें कोई दो राय नहीं कि इन चुनावों के परिणाम और प्रभाव वर्ष २०२२ में कराये जानेवाले चुनावों में स्पष्टत: दिखेंगे, यद्यपि ज़िला-पंचायत-चुनावों का मनोविज्ञान विधानसभाओं और लोकसभा-चुनावों से भिन्न होता है; परन्तु इन ज़मीनी चुनावों से भारतीय जनता पार्टी का 'खोखलावाद' ज़ाहिर हो चुका है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी का यह वर्चस्व बना रहना चाहिए। इसके लिए अखिलेश यादव को जातीय मनोवृत्ति से परे रहकर सभी के लिए समदर्शी बनकर लोकहित में पारदर्शी काम करने होंगे।   अन्य दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों ने जिस तरह से सर्वाधिक सीटें पायी हैं, उन्हें समाजवादी दल, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी तथा काँग्रेस पार्टीवाले अपना-अपना प्रत्याशी बता रहे हैं। ऐसे में, देखना यह भी दिलचस्प रहेगा कि  तीनों दलों में से कौन-सा दल 'साम-दान-दण्ड-विभेद' की नीतियों के आधार पर ज़िलापंचायत-अध्यक्ष के चुनावों के समय उत्तरप्रदेश ज़िला-पंचायत में अपना वर्चस्व स्थापित करता है।

 prithwinathpandey@gmail.com

url and counting visits