रामचन्द्र द्विवेदी ‘प्रदीप’ की पुण्यतिथि (११ दिसम्बर) पर ‘सर्जनपीठ’ का विशेष आयोजन

“ऐ मेरे वतन के लोगो! ज़रा आँख मे भर लो पानी”– प्रदीप

हमारे इलाहाबाद मे, जो वर्तमान मे प्रयागराज के नाम से जाना जाता है, एक-से-बढ़कर- एक प्रतिभाएँ रही हैं, जिनका लोहा विश्व मानता आ रहा है। संस्कृति, शिक्षा, अध्यात्म, साहित्य, क्रीड़ा, विज्ञान, इतिहास आदिक क्षेत्रों मे इलाहाबाद का कोई जवाब नहीं रहा है। उन्हीं मे से एक जाना-माना नाम रहा है, ‘प्रदीप’ का, जिनकी शैक्षिक और साहित्यिक कर्मभूमि दारागंज, इलाहाबाद रही है। उन्होंने ७१ फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी १८,०० गीतों की रचना की थी; किन्तु उनके एक ही गीत ने उन्हें अमर कर दिया है; उस गीत का नाम है, “ऐ मेरे वतन के लोगो! ज़रा आँख मे भर लो पानी… जब अन्त समय आया तो कह गये कि हम मरते हैं, ख़ुश रहना देश के प्यारो! अब हम तो सफ़र करते हैं।”

उन्हीं अमर गायक प्रदीप की स्मृति मे ‘सर्जनपीठ’ की ओर से ११ दिसम्बर को ‘गायक प्रदीप और उनकी राष्ट्रीयता’ विषय पर प्रयागराज से एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।

मुम्बई की फ़िल्म-समीक्षक डॉ० राधा तनेजा ने बताया, “प्रदीप जी का जीवन संघर्ष से भरा हुआ था। उनके माता-पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा एक कुशल अध्यापक बने; परन्तु प्रदीप जी को स्वीकार नहीं था और बम्बई के एक कवि-सम्मेलन ने उन्हें महान् सिने-गायक बना दिया था। उनकी पहली फ़िल्म ‘कंगन’ थी, जो ‘हिट’ रही। उनका ‘बन्धन’ फ़िल्म का गीत “चल-चल रे नौजवान” को सिन्ध और पंजाब की विधानसभा ने राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी थी।”

आयोजक आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने एक मार्मिक घटना-प्रसंग सुनाया था, ”भारत चीन से पराजित हो चुका था। ऐसे में, भारतीय सेना के मनोबल को उत्साह, उमंग तथा नयी ऊर्जा देने के उद्देश्य से प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी ने २६ जनवरी, १९६३ ईसवी को बम्बई में देशभक्तिपूर्ण एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कराया था, जिसमें विशेष रूप से प्रदीप से देशभक्ति से भरे एक गीत-रचना करने का आग्रह किया गया था। उस शौर्य-समारोह के लिए प्रदीप ‘परम्परा’ से हटकर कुछ विशेष रचना चाह रहे थे। वे इसी उधेड़बुन में सान्ध्य-बेला में ‘माहिम’, बम्बई में वैचारिक भ्रमण कर रहे थे कि अकस्मात् उनके होठ स्पन्दित हो उठे। उन्होंने तत्काल सिगरेट का एक पैकेट ख़रीदा और उसी पर उस गीत का बोल “ऐ मेरे वतन के लोगो! ज़रा आँख मे भर लो पानी” लिपिबद्ध कर दिया था, ताकि भविष्य का वह ‘कालजयी’ बोल विस्मृत न हो सके। अन्तत:, वह गीत आज भी देशवासियों के होठों से चिपक कर रह गया है।”

साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कहा, “वर्ष १९९८ में ‘दादा साहब फालके’ सम्मान से अलंकृत प्रदीप के अँगरेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ १९४३ ई० में ”दूर हटो ऐ दुनियावालो हिन्दुस्तान हमारा है” अथवा वर्ष १९६२ में भारतीय सिनेमा-जगत् की ओर से वीरों को श्रद्धांजलि देने के लिए “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी’ गीत सुनकर तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू-सहित देश की अवाम के आँसू छलक आये थे। कवि प्रदीप ने १९९८ में आज की ही तिथि मे अन्तिम साँस लेने से देश-भक्ति से ओतप्रोत सैकड़ों गीतों को देशवासियों के हवाले कर, सदैव-सदैव के लिए अमर हो चुके हैं।”

भोपाल की डॉ० सुनीता निगम ने बताया, “प्रदीप जी का जन्म तत्कालीन मध्यप्रदेश-प्रान्त के अन्तर्गत उज्जैन के बड़नगर मे हुआ था; परन्तु उन्हें साहित्यिक संस्कार इलाहाबाद के समृद्ध सारस्वत वातावरण से प्राप्त हुआ था, फिर उनका बम्बई पहुँचना, उनके लिए वरदान साबित हुआ था।”

इस आयोजन मे डॉ० रंजन वर्मा (जबलपुर), डॉ० दिशि प्रधान (दिल्ली), डॉ० रविकान्त वर्मा (मेरठ), डॉ० शान्तनु अग्रहरि (नागपुर) तथा डॉ० शिवम प्रकाश (पुणे) की प्रभावकारी सहभागिता रही।