हिन्दी भाषा की शुचिता और राष्ट्रभाषा पर प्रश्न

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


हमारे देश में ऐसे लोग की संख्या बहुत है, जो कहते हुए सुने जाते हैं : भाषा की शुद्धता ज़रूरी नहीं है; भाषा किसी भी तरह से सम्प्रेषित हो जाये, यही हमारा उद्देश्य रहता है।
ऐसे ही लोग हिन्दीभाषा की पवित्रता के साथ बलप्रयोग करते हुए “रँगे हाथों” पकड़े जा रहे हैं। आज़ादी के बाद देश में हिन्दी के पठन-पाठन की रुचि उत्पन्न करने के लिए उद्देश्यपरकता के साथ कार्य किये जाते तो आज अधिकतर लोग सहज-सरल शब्दों की वर्तनी अशुद्ध रूप में प्रयोग नहीं कर रहे होते और बताने-समझाने के बाद भी उच्चारण और लेखन में अशुद्धियाँ नहीं कर रहे होते।
यहाँ बहुत ही क्लिष्ट और परिमार्जित हिन्दी के प्रयोग का विषय नहीं है, विषय यह है कि जो भी सरल-सहज रूप में लिखा जा रहा है; उच्चारण किया जा रहा है, उनमें व्याकरण के सामान्य नियमों की उपेक्षा तो न हो। जो लोग ‘हुए ‘ को ‘हुये’, ‘हुई’ को ‘हुयी’, ‘स्वीकार किया’ को ‘स्वीकारा’, ‘कि’ को ‘की’, ‘चाहिए’ को ‘चाहिये’, ‘दान किया’ को ‘दान दिया’, ‘पुरस्कार’ को ‘पुरुस्कार’, ‘विशिष्ट’ को ‘विशिष्ठ’, ‘मृतक’ को ‘दिवंगत आत्मा’, ‘बीभत्स’ को ‘वीभत्स’, ‘विद्वज्जन’ को ‘विद्वानजनों’, ‘प्रज्वल’ को ‘प्रज्जवल’ और ‘प्रज्ज्वल’, ‘महसूस करना’ को ‘महसूसना’ ‘अनुगृहीत’ को ‘अनुग्रहित’, ‘गृहिणी’ को ‘गृहणी’, ‘सौहार्द’ को ‘सौहार्द्र’ आदिक हज़ारों अशुद्ध शब्दों के प्रयोग करते हैं तो उन पर कठोर आपत्ति प्रकट की जायेगी और सबसे पहले मैं ही विरोध करूँगा। यही कारण है कि हमारा पढ़ा-लिखा समाज जितना पढ़ और जान-समझ लिया है, उससे आगे बढ़ना ही नहीं चाहता। यदि बढ़ता भी है तो अपने लिए। कितने लोग हैं, जो परमार्थभाव को लिए जीवटता के साथ हिन्दीभाषा की शुचिता बनाते हुए नयी पीढ़ी का मार्गदर्शन कर रहे हैं? सरकार और सरकारी नौकरी करनेवाले ग़ुलाम हो जाते हैं, इसलिए इस दिशा में उनसे अपेक्षा करना उचित नहीं है परन्तु वे भी हिन्दी-भाषा का अशुद्ध प्रयोग करेंगे तो उनकी शिक्षा-दीक्षा पर हम प्रश्न अवश्य खड़े करेंगे। जो अवकाशप्राप्त हैं, उनमें से कितने लोग हिन्दी को समृद्ध कर रहे हैं? सच तो यह है कि आज के साहित्यकार-लेखक-समीक्षक अपने लिए जी रहे हैं; सर्वत्र उनकी ही प्रतिष्ठा होती रहे, उनकी शिक्षा का उद्देश्य यहीं तक सीमित रह जाता है। यही कारण है कि भारतीय भाषाओं के उत्थान के प्रति उनमें कोई चिन्ता नहीं है। ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ आज लिखा जाता है तो उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता, जो अहिन्दीभाषा-भाषी रहते हुए, हिन्दीसाहित्य की श्रीवृद्धि में अपना महत् योगदान किये थे और करते आ रहे हैं।
हिन्दीभाषा को समृद्ध-सम्पन्न करने के उद्देश्य से जितने भी शासकीय-अशासकीय संस्थान निर्धारित हैं, वहाँ के अध्यक्ष, निदेशक आदिक अधिकारी शासकीय अनुदानों का अर्थपूर्ण उपयोग नहीं करते, क्यों? ऐसे लोग का हिन्दी-लेखन देख-पढ़कर कहीं से ऐसा नहीं लगता कि उन्हें हिन्दी-व्याकरण का सामान्य बोध भी है और उनके बारे में बताया जाता है कि कई ग्रन्थों के लेखक हैं; प्राध्यापक हैं तथा कई भाषाओं के ज्ञाता भी।
अब उस विषय पर प्रकाश डालता हूँ, जो चिर-प्रतीक्षित है और वह विषय है, हिन्दी का राष्ट्रभाषा न बन पाने का मूल कारण। अहिन्दी और हिन्दीभाषा-भाषी रचनाधर्मी प्रवासी के रूप में एक-दूसरे के राज्यों में क्यों नहीं जाते? एक-दूसरे की भाषा का आदान-प्रदान क्यों नहीं करते? वहाँ एक-दूसरे के साहित्य का अनुवाद करने, एक-दूसरे के यहाँ साहित्यिक और भाषिक आयोजन क्यों नहीं करते? ऐसा यदि हो जाता है तो जो एक-दो राज्य राजनीतिक कारणों से हिन्दी का विरोध कर रहे हैं, वे हिन्दी को स्वत: अपना लेने की स्थिति में आ जायेंगे।
उक्त विषयों में शासकीय सहायता की अपेक्षा करना कदापि उचित नहीं होगा, क्योंकि केन्द्र-राज्यसरकारें फूट डालकर सत्ता की राजनीति कर रही हैं। ऐसे में, वे भला क्यों चाहेंगी कि हिन्दी राष्ट्रभाषा बने।
भाषा-शुचिता की महत्ता की उपेक्षा करते हुए, हिन्दी का विस्तार करना घातक भूल होगी। जिस प्रकार बहुसंख्यक कहा करते थे कि गंगा नदी में हर तरह की गन्दगी को आत्मसात् कर उसे शुद्ध करने की क्षमता है; और एक समय ऐसा आया कि गन्दगी को आत्मसात् करते-करते गंगा इतनी ‘मैली’ बन गयीं कि वे अपने मूल जल की एक बूँद तक को देखने के लिए तरस गयी हैं, परिणामस्वरूप केन्द्रसरकार को ‘नमामि गंगे’ परियोजना लानी पड़ी और वह भी अब “टायँ-टायँ फिस्स” है। वही स्थिति हमारी हिन्दी की भी होती जा रही है। यह ऐसा विषय है, जिस पर आमने-सामने बैठकर खुलकर संवाद किया जा सकता है।