शिवत्व की यात्रा : धर्म और प्रेम का द्वंद्व


रात धीरे-धीरे गहरी हो चुकी थी। आकाश में चन्द्रमा बादलों के पीछे छिपता-उभरता जा रहा था। सुधांशु के घर के आँगन में एक दीपक जल रहा था जिसकी लौ हवा के हल्के झोंकों से कभी डोलती, कभी स्थिर हो जाती।

माधवी उसी दीपक के सामने बैठी थी।

सुधांशु कुछ दूर खड़ा आकाश को देख रहा था। उसके भीतर कई विचार एक साथ उठ रहे थे। वर्षों की साधना ने उसे शांत अवश्य किया था, किन्तु गृहस्थ जीवन में लौटते ही उसने अनुभव किया कि मन के प्रश्न फिर से जागने लगे हैं।

कुछ देर बाद माधवी ने मौन तोड़ा।

“आपने कहा था कि गृहस्थ जीवन भी तप है,” उसने धीमे स्वर में कहा, “किन्तु मैं समझ नहीं पाती कि तपस्या और गृहस्थ जीवन एक साथ कैसे हो सकते हैं।”

सुधांशु धीरे-धीरे उसके पास आकर बैठ गया।

उसने कुछ क्षण तक दीपक की लौ को देखा, फिर बोला—

“तपस्या का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है, माधवी। वास्तविक तपस्या वह है जिसमें मन अपने स्वार्थ को त्यागना सीखता है।”

माधवी ने उसकी ओर देखा।

“क्या आप यह कहना चाहते हैं कि गृहस्थ जीवन में स्वार्थ त्यागना पड़ता है?”

सुधांशु हल्के से मुस्कराया।

“गृहस्थ जीवन ही वह स्थान है जहाँ मनुष्य को सबसे अधिक बार अपने स्वार्थ का त्याग करना पड़ता है। माता अपने बच्चों के लिए त्याग करती है, पिता परिवार के लिए श्रम करता है, पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए अपने अहंकार को छोड़ते हैं।”

वह कुछ क्षण रुका, फिर बोला—

“यही कारण है कि हमारे शास्त्रों ने गृहस्थाश्रम को सभी आश्रमों का आधार कहा है। क्योंकि यदि गृहस्थ धर्म से विचलित हो जाए, तो समाज की पूरी व्यवस्था ही टूट जाती है।”

माधवी ध्यान से सुन रही थी।

किन्तु उसके मन में अभी भी एक प्रश्न था।

“यदि गृहस्थाश्रम इतना महत्वपूर्ण है,” उसने कहा, “तो फिर इतने ऋषि-मुनि वन में जाकर तप क्यों करते थे?”

सुधांशु ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“क्योंकि हर आत्मा का मार्ग अलग होता है। कुछ लोग संसार से दूर जाकर सत्य की खोज करते हैं, और कुछ लोग संसार के भीतर रहकर।”

फिर उसने गम्भीर स्वर में कहा—

“किन्तु जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन में रहकर धर्म का पालन करता है, उसका तप अधिक कठिन होता है।”

माधवी ने पूछा—

“क्यों?”

सुधांशु ने कहा—

“क्योंकि वन में मनुष्य केवल अपने मन से लड़ता है… पर गृहस्थ जीवन में उसे अपने मन के साथ-साथ परिस्थितियों से भी लड़ना पड़ता है।”


कुछ क्षण तक दोनों मौन रहे।

आँगन में शीतल हवा बह रही थी।

तभी माधवी ने एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसने सुधांशु को भीतर तक झकझोर दिया।

“यदि किसी दिन आपको यह अनुभव हो कि आपके धर्म का मार्ग और हमारे जीवन का मार्ग अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं… तब आप क्या करेंगे?”

सुधांशु ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में कोई आरोप नहीं था, केवल एक गहरा भय था।

वह समझ गया कि यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं है।

यह उस स्त्री का प्रश्न है जिसने वर्षों तक प्रतीक्षा की है।

सुधांशु ने गहरी साँस ली।

फिर उसने बहुत शांत स्वर में कहा—

“माधवी, धर्म का अर्थ केवल नियमों का पालन करना नहीं है। धर्म का अर्थ है—जो सत्य, करुणा और न्याय को जीवित रखे।”

माधवी ने पूछा—

“तो क्या प्रेम धर्म का हिस्सा नहीं है?”

सुधांशु ने तुरंत उत्तर दिया—

“प्रेम ही तो धर्म का हृदय है।”

फिर उसने धीरे से कहा—

“किन्तु वह प्रेम जो किसी को अधर्म की ओर ले जाए, वह प्रेम नहीं… मोह है।”

माधवी ने कुछ क्षण तक उसे देखा।

फिर बोली—

“आपकी बातें बहुत गहरी हैं… किन्तु जीवन हमेशा इतना स्पष्ट नहीं होता।”

सुधांशु मुस्कराया।

“हाँ, जीवन कभी स्पष्ट नहीं होता। इसी कारण तो साधना की आवश्यकता होती है।”


तभी दूर कहीं से शंख की ध्वनि सुनाई दी।

रात के उस सन्नाटे में वह ध्वनि अत्यंत रहस्यमयी लग रही थी।

माधवी चौंक गई।

“इस समय शंख की ध्वनि…?”

सुधांशु भी आश्चर्य में पड़ गया।

“हमारे गाँव में इस समय कोई मंदिर भी नहीं खुला होता।”

दोनों कुछ क्षण तक उस दिशा की ओर देखते रहे।

फिर अचानक सुधांशु को एक बात याद आई।

आचार्य के शब्द—

“तुम्हारी परीक्षा तुम्हारे ही घर में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है।”

उसका मन एक क्षण के लिए काँप उठा।

उसी समय घर के बाहर किसी के कदमों की आहट हुई।

किसी ने द्वार खटखटाया।

रात का वह समय, और अचानक आया हुआ कोई अतिथि…

सुधांशु धीरे-धीरे उठकर द्वार की ओर बढ़ा।

माधवी के मन में भी एक अज्ञात आशंका जन्म लेने लगी।

जब सुधांशु ने द्वार खोला, तो सामने एक वृद्ध संन्यासी खड़े थे।

उनकी दाढ़ी श्वेत थी, नेत्र अत्यंत तेजस्वी थे।

उन्होंने सुधांशु को ध्यान से देखा।

फिर मुस्कराकर कहा—

“वत्स, क्या तुम ही सुधांशु हो?”

सुधांशु ने हाथ जोड़ लिए।

“हाँ, मैं ही हूँ।”

वृद्ध संन्यासी ने कहा—

“मैं तुम्हारे आचार्य का संदेश लेकर आया हूँ।”

सुधांशु का हृदय तेजी से धड़कने लगा।

“क्या संदेश?”

संन्यासी ने गम्भीर स्वर में कहा—

“तुम्हारी पहली परीक्षा अब आरम्भ हो चुकी है।”

आँगन में खड़ी माधवी यह सब सुन रही थी।

और उसी क्षण उसे लगा—

उसका जीवन अब एक ऐसी कथा में प्रवेश कर चुका है,
जहाँ हर घटना के पीछे कोई अदृश्य योजना छिपी हुई है।