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पुरस्कार-सम्मान का यथार्थदर्शन

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

दशकों पहले आधिकारिक विद्वान् और विषयज्ञाता को पुरस्कार से समलङ्कृत किया जाता था, तब उसके कर्तृत्व-विषय के प्रति एक जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती थी; क्योंकि तब चयनकर्त्ता आधिकारिक हस्ताक्षर हुआ करते थे; फिर भी परीक्षण और मूल्यांकन के प्रति सत्यनिष्ठा पूर्णत: नहीं होती थी; परन्तु आज की तुलना मे उनकी कर्त्तव्यपरायणता अधिक देखी जाती थी। अब तो पुरस्कार-सम्मान पाने के लिए जाने-माने चेहरे इधर-उधर मुँह मारा करते हैं और चयनकर्त्ता भी अयोग्य, अपात्र तथा अक्षम होते हैं। ऐसा इसलिए कि उनका मनोनयन उनकी अभियोग्यता पर नहीं, अपितु ‘चाटुकारिता’ के आधार पर किया जाता है; ‘पहचान’ और ‘पहुँच’ के आधार पर किया जाता है।

श्रेयस्कर रहता, यदि पुस्तकों और समग्र कर्तृत्व के आधार पर बाँटे जानेवाले पुरस्कार-सम्मान का मानक ‘योग्यता’ निर्धारित किया जाता और अपाहिज़ चयनकर्त्ताओं, संस्तुतिकर्त्ताओं के स्थान पर विषय-विशेषज्ञों और सिद्धहस्त मनीषियों को समादरपूर्वक निमन्त्रित किया जाता। जो स्वाभिमानी और स्वाध्यायी सर्जक होता है, वह किसी भी प्रकार के पुरस्कार-सम्मान का धन्धा करनेवाले संस्थान के अधिकारियों से स्वयं की दूरी बनाकर रहता है।

यह कथन शासकीय-अर्द्ध-शासकीय पुरस्कार-सम्मानो पर पूर्णत: लागू होता है। जो लोग जिस विषय पर पुरस्कार-सम्मान हथियाते आ रहे हैं, उनमे से ९५ प्रतिशत की योग्यता ‘चाटुकारिता’ की होती है। पुरस्कार-सम्मान लुटानेवाले संस्थानो, ऐकडेमियों, परिषदों तथा अन्य संस्थानो की ओर से जिस दिनांक से पुरस्कार-सम्मान की विज्ञप्ति प्रसारित की जाती है तब से बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा होता है, जो सम्बन्धित पुरस्कार-सम्मान पाने के लिए इतना तत्पर हो जाता है कि उसकी अपनिष्ठा देख-समझकर वैसे लोग की आचरण की सभ्यता पर घिन आने लगती है। वैसे लोग संस्थानो के उन अध्यक्षों, निदेशकों आदिक के घरों और कार्यालयों मे चक्कर लगाकर, सिफ़ारिशी पत्र सौंपकर पुरस्कार-सम्मान की याचना करते देखे जाते हैं, जो राजनेताओं के तलुए चाटते हुए वैसे पद पर पहुँचते हैं।

ऐसे लोग पर केवल दया आती है। अत्युत्तम होता है, एल्युमीनियम के कटोरे दोनो हाथों मे लेकर लखनऊ-स्थित हज़रतगंज चौराहे पर जा खड़े होते।

धिक्कार है! विज्ञान की समझ नहीं और कतिपय अपाहिज़ों की बेईमान संस्तुति पर ‘विज्ञान का शीर्षस्थ पुरस्कार’ झटक लेते हैं; साहित्य का सम्यक् बोध नहीं और ‘साहित्यभूषण’ बन जाते हैं; हिन्दीभाषा के क ख ग घ का संज्ञान नहीं और ‘हिन्दी-गौरव’ कहलाते हैं। इसके लिए सर्वाधिक बीभत्स चरित्र के वे लोग हैं, जो ऐसे कुण्ठित-लुण्ठित लोग का चयन करते आ रहे हैं।

आश्चर्य तब होता है जब जाने-माने लोग महा लालची चरित्र के दिखते हैं। उनमे से कई ऐसे हैं, जो पहले वर्ष पुरस्कार-सम्मान झटक लेते हैं और दूसरे वर्ष पुरस्कार-सम्मान की आयोजन-समिति मे स्वयं को शामिल करा लेते हैं; वही निन्द्य लोग तीसरे वर्ष स्वयं को पुरस्कार-समिति से अलग कर पुरस्कार झटकनेवाले बन जाते हैं। इस प्रकार यह क्रम चलता रहता है। यदि विश्वास न हो तो सम्बन्धित संस्थानो आदिक मे जाकर देखा जा सकता है अथवा ‘सूचना के अधिकार’ के अन्तर्गत इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

दो-ढाई लाख रुपयों के लिए कथित जाने-माने चेहरे स्वयं को इतना गिरा सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर उन सभी भ्रष्ट चरित्रवाले साहित्यकारों, भाषा के जानकारों, विज्ञानलेखकों, सम्पादकों, पत्रकारों आदिक के गालों पर भरपूर तमाचा मारता है।

संस्थानो मे जो शीर्षस्थ अधिकारी हैं; उनके अन्तर्गत काम करनेवाले महिला-पुरुषकर्मी हैं, वे नख-शिख बेईमान होते हैं। यही कारण है कि समाज का एक वर्ग उन पुरस्कार-सम्मानो के प्रति विरक्त रहता है; क्योंकि वह इस सत्य से बहुविध अवगत है कि उक्त भौतिकता से नितान्त परे रहकर अपने मूल सारस्वत कर्म के प्रति निष्ठावान् बने रहना ही सुखद स्थिति है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ अगस्त, २०२२ ईसवी।)