सहज और सरस आचरणसहित मनुष्य मे ही स्वभावत: ‘विनयशीलता’ रहती है। उसकी वही नमनशीलता कर्कश चरित्र को भी शीतल कर देती है। ऐसे ही लोग वस्तुत: ‘साधु’, ‘संत’, ‘महात्मा’, ‘पीर-फ़क़ीर’ इत्यादिक हैं; उनसे इतर साधु, संत, महात्मा तथा पीर-फ़क़ीर कहलानेवाले लोग तो अवसरजीवी और आडम्बरजीवी होते हैं।
साधु-संत तथा पीर-फ़क़ीर की जीवनशैली बाह्याडम्बररहित (‘वाह्याडम्बर’ अशुद्ध है।) होती है। वे उपायचतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष; साम, दाम, दण्ड तथा विभेद) से परे होते हैं; क्योंकि उनके मन-मस्तिष्क मे ‘साधन चतुष्टय’ का बीज अंकुरण का श्रेय पा चुका रहता है। उनके हृदयप्रान्त से एक ऐसे सांगीतिक आरोह-अवरोह का स्रोत फूटता रहता है, जिसमे से एक ही ध्वनि कर्णकुहरित होती है, “सर्वे भवन्तु सुखिन:।”
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)