डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
यह सत्य है कि आज (३१ मई, २०१८ ई०) १० राज्यों में १० विधानसभा और ४ लोकसभा के उपचुनावों के परिणामों में भारतीय जनता पार्टी मात्र १-१ सीट जीत सकी है। इन परिणामों ने एन०डी०ए०, विशेषत: भारतीय जनता पार्टी के विजयरथ के पहियों को आगे बढ़ने से रोक दिया है और तथाकथित ‘मोदी मैजिक’ की हवा निकाल दी है; परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि भारतीय जनता पार्टी को कमतर करके आँका जाये। वहीं यह भी सत्य है कि भारतीय जनता पार्टी का ज़ुम्लेबाज़ी चरित्र और देश-समाज को बाँटकर अपना उल्लू सीधा करने की रणनीति को देश की जनता ने अपना उत्तर देना शुरू कर दिया है, जो लोकतन्त्र को सुदृढ़ करने के लिए एक शुभ संकेत है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की बहुत बुरी पराजय के पीछे ‘राष्ट्रीय’ विषय रहे हैं और क्षेत्रीय मुद्दे भी। जहाँ पिछले लोकसभा-चुनाव-परिणाम स्वरूप भारतीय जनता पार्टी के पास २८२ सीटें थीं, वहीं अब वर्तमान में घटकर २७३ सीटें रह गयी हैं, जिसमें लोकसभा-स्पीकर की एक सीट है। इस तरह भारतीय जनता पार्टी के पास बहुमत से मात्र १ सीट अधिक है।
पिछले ५ वर्षों में तथाकथित मोदी-सरकार और उत्तरप्रदेश में योगी-सरकार ज़मीनी हक़ीक़त से बहुत दूर रहकर हिन्दू, गोरक्षा, राममन्दिर तथा दलित की गर्हित राजनीति कर समाज को बाँटने में कोई क़सर नहीं छोड़ी है। बैंकों के भ्रष्टाचार सबने देखे हैं; देश के किसानों को सुख-सुविधा देने की कोरी घोषणा और गन्ना किसानों के उत्पादन की उपेक्षा करते हुए, अपने आश्वासनों से पीठ दिखाते हुए, पाकिस्तान से चीनी का आयात किया जा रहा है। बेरोज़गारों से ‘पकौड़ा’ बेचवाने का मन्त्र भी उलटा पड़ चुका है; लगातार डीज़ल-पेट्रोल, घरेलू गैस महँगी कर जनसामान्य की कमर तोड़ने पर ‘मोदी-सरकार’ तुल गयी है, जिसका स्पष्ट विरोध भी दिखने लगा है। अपने गठबन्धन दलों की उपेक्षा भी मोदी की नीतियों पर भारी पड़ चुकी है।
उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी उत्तरप्रदेश की जनता के प्रति वफ़ादार नहीं दिखते। यही कारण है कि जिस व्यक्ति को राज्य की जनता ने अपना मुख्य मन्त्री बनवाया था, वह ‘पोस्टर ब्वॉय’ बनकर दूसरे राज्यों में जा-जाकर दूसरों के लिए चुनाव-प्रचार करता रहा है। ऐसे में, योगीराज को झटका दिया जाना ज़रूरी था।
किसी भी राज्य का शासन ऐसे नहीं चलाया जाता। आदित्यनाथ योगी को यह नहीं भूलना चाहिए कि लूट, भ्रष्टाचार, अयोग्यों की नियुक्ति, बेरोज़गारी, जातिवादिता, मुसलमानों पर अतिरिक्त मेहरबान होने आदिक गन्दगियों के कारण मुलायम, मायावती तथा अखिलेश को यहाँ की जनता धूल चटा चुकी है।
अभी तक उत्तरप्रदेश में सड़कें गड्ढामुक्त नहीं हो पायी हैं; स्थान-स्थान पर सड़कें खोद दी गयी हैं; स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवादिक की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो चुकी है। किसानों को उनके अन्न का समर्थन मूल्य तक नहीं मिलता; उनका मूल धन तक उन्हें प्राप्त नहीं हो पाता। वहीं मुसलिम-समुदाय के प्रति शासकीय वैमनस्य का प्रतिक्रिया और प्रभाव भी इन चुनाव-परिणामों पर पड़ा है :– मुसलिम प्रत्याशी ने धूल चटा दी है। इन चुनाव-परिणामों पर लखनऊ में टी०ई०टी०-बी०एड्० अभ्यर्थियों की न्यायपूर्ण माँग की उपेक्षा की भी प्रतिक्रिया दिख रही है।
अब इसके विपरीत पक्ष पर विचार करते हैं :—
यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि विपक्षी दलों का गठबन्धन लोकतन्त्र के पक्ष में विश्वसनीय होगा। जब केन्द्र और राज्य पर एकाधिकार के साथ सत्ता की राजनीति दिखने लगती है तब ‘गठबन्धन की राजनीति’ शिथिल पड़ने लगती है और यहीं पर एक ईमानदार गठबन्धन की पहचान रेखांकित होती है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण की काँग्रेस की तत्कालीन स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध ‘समग्र क्रान्ति’ की रणभेरी बजी थी और परिणामस्वरूप काँग्रेस-निरपेक्ष दलों का एक गठबन्धन ‘भारतीय जनता दल’ का अस्तित्व उभरा था। देशवासियों ने उस गठबन्धन को बहुमत के साथ सत्ता सौंपी थी; परन्तु कुछ ही दिनों बाद उस गठबन्धन में सम्मिलित प्रमुख नेताओं की अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा ने गठबन्धन की सरकार को इतना कमज़ोर कर दिया था कि गठबन्धन का अस्तित्व बालू की दीवार की तरह से भरभरा गया।
‘शासक-निर्माता’ के रूप में अग्रणी राज्य उत्तरप्रदेश को माना जाता है। जिस दिन से अवसर मिलने पर प्रधान मन्त्री बनने की बात को राहलु गांधी स्वीकार कर चुके हैं उस दिन से मायावती और ममता बनर्जी सँभल चुकी हैं; क्योंकि अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षी मायावती की नज़र सीधे ‘दिल्ली’ यानी केन्द्र की गद्दी पर है। ममता केन्द्रीय मन्त्री भी रह चुकी हैं; अत: वे भी ‘प्रधान मन्त्री’ बनने का ख़्वाब देख रही हैं। वहीं अभी हाल ही में जिस तरह से ‘सुशासन बाबू’ यानी नीतीश कुमार ने मोदी की नीतियों की भर्त्सना करनी शुरू कर दी है, उससे वे आगे चलकर ‘मोदी’ के विकल्प के रूप में स्वयं को सामने ला सकते हैं।
उत्तरप्रदेश में काँग्रेस ‘वेंटिलेटर’ पर है। सोनिया और राहुल गांधी का मिज़ाज देश की जनता समझ नहीं पा रही है। इन दोनों की मनोवृत्ति काँग्रेस को शिथिल बनाती जा रही है।
वर्ष २०१४ के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पहले स्थान पर थी, समाजवादी पार्टी दूसरे स्थान पर, तीसरे स्थान पर काँग्रेस थी। मायावती की बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। जब सीटों के बँटवारे का समय आयेगा तब ब०स०पा०, काँग्रेस, रा०लो०द० आदिक दलों के नेताओं की महत्त्वाकांक्षा गठबन्धन-नीति पर भारी पड़ सकती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, वर्ष २०१९ के चुनाव बेहद दिलचस्प रहेंगे; पल-पल समीकरण बदलते नज़र आयेंगे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३१ मई, २०१८ ई०)