राहुल सांकृत्यायन क्रान्तिकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे― विभूति मिश्र

राहुल सांकृत्यायन की पुण्यतिथि (१४ अप्रैल) के अवसर पर ‘सर्जनपीठ’ की संगोष्ठी

‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ के प्रणेता और यायावरी वृत्ति के पोषक राहुल सांकृत्यायन की पुण्यतिथि के अवसर पर १४ अप्रैल को ‘सारस्वत सदन’, अलोपीबाग़, प्रयागराज से ‘राहुल सांकृत्यायन की दृष्टि और सृष्टि’ विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने की थी। श्री मिश्र ने बताया, “राहुल सांकृत्यायन क्रान्तिकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे। वर्ष १९१७ की रूसी क्रान्ति का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था, जिसके कारण वे साम्यवादी विचारधारा के पोषक हो गये। उनका हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रति गहरा लगाव था। यही कारण है कि २७ दिसम्बर, १९४७ ई० से लेकर ३१ दिसम्बर, १९४७ ई० तक मुम्बई मे आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पैंतीसवें अधिवेशन मे सभापति रहे।”

मेरी लूकस स्कूल ऐण्ड कॉलेज, प्रयागराज के प्रवक्ता डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने बताया, “राहुल जी न केवल हिन्दी-साहित्य, अपितु भारतीय वाङ्मय के एक ऐसे महारथी हैं, जिन्होंने प्राचीन और नवीन, पौवार्त्य और पाश्चात्य दर्शन, राजनीति तथा जीवन के उन अछूते तथ्यों पर प्रकाश डाला है, जिनकी ओर सामान्यजन की दृष्टि नहीं गयी। वे ताउम्र सहज स्वाभाविक परिवर्त्तनशीलता के लिए यायावर बना रहे।”

आयोजक भाषाविज्ञानी एवं समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा,”राहुल सांकृत्यायन का इलाहाबाद के प्रति विशेष प्रेम उल्लेखनीय रहा है। वे जब भी अपनी यात्राओं को पूर्ण करने के बाद वापस होते थे तब थकान मिटाने और सारस्वत खुराक पाकर पुन: पुष्ट होने के लिए इलाहाबाद ही आते थे। उनकी अधिकतर पुस्तकों का लेखन, मुद्रण तथा प्रकाशन इलाहाबाद से ही हुआ है। ४ सितम्बर, १९३७ ई० को वे पहली बार इलाहाबाद आये थे और उसी वर्ष ६ सितम्बर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे ‘मेरी कमज़ोरियाँ’ विषयक उनका व्याख्यान आयोजित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता पं० जवाहरलाल नेहरू ने की थी।”

शासकीय महाविद्यालय, हटा, दमोह (म० प्र०) मे हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० आशा राठौर का मत था, “राहुल सांकृत्यायन ऐसे साहित्य-सर्जकों में से थे, जिनके जीवन और साहित्य में एकरूपता दिखायी देती हैं। उनका सम्पूर्ण साहित्य उनके अन्तर्मन के द्वन्द्व, ज्ञान के प्रति तीव्र जिज्ञासा, दिमाग़ी ग़ुलामी से मुक्ति की छटपटाहट का साहित्य है। उनके अन्दर ग़ज़ब की तर्कशक्ति थी। बिना तर्क की कसौटी पर कसे वे किसी भी प्रकार के ज्ञान को स्वीकार नहीं करते थे।”

कानपुर की साहित्यकार वीना उदय ने बताया, राहुल जी ने पाँच बार तिब्बत, लंका तथा सोवियत संघ की यात्राएँ की थीं; यूरोप में छ: माह बिताये थे तथा कोरिया, मंचूरिया, ईरान, अफग़ानिस्तान, जापान, नेपाल, उत्तर से दक्षिण तक भारत के विभिन्न स्थानों की यात्राएँ की थीं।
उपसम्पादक― शोध-दिशा, जैनशोध अकादमी, अलीगढ़ की विद्याप्रभाकर डॉ० कनुप्रिया प्रचण्डिया ने कहा, “राहुल सांकृत्यायन दकियानूसी और पुरानेपन पर मौलिक चिन्तन कर, सामाजिक समस्याओं के यथार्थ और वैज्ञानिक निराकरण के प्रस्तोता थे। मानवता के दुःख-दर्द के प्रति यथार्थ सहानुभूति और करुणामयी दृष्टि की प्रस्तुति उनकी विशेषता थी।”