आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

● ख़ुदग़रज हँसी बनाम ख़ुद्दार तबस्सुम

सच, हँसी कितनी हसीन होती है और गुस्ताख़ भी कि आप चाहकर भी उससे अलग नहीं हो सकते। शातिर हँसी तो इंसान की फ़ित्रत का बाख़ूबी बयान करती है। बेअदब हँसी की रवानगी शातिर दिलो दिमाग़ को खुराक देती रहती है। तीरछी नज़र की हँसी न जीने देती है और न ही मरने देती है। फ़र्क़ है, नज़रिय: का। तंग नज़रिय: वाली हँसी भरपूर जीती रहती है, बेहद बेशर्म मानिन्द, जो ख़िदारत (अवगुण्ठन में रहना) की शक़्ल में रहती है; किन्तु ख़िदाज़ (क्षति) पहुँचाने और ख़िदाअ (छल) करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती। दूसरी ओर, तबस्सुम (मृदुहास) की सुरूर और लज़्ज़त एक अलग ही अन्दाज़ में ख़ुद को पेश करती है, जिसमें पाक़ीज़गी की नज़रनवाज़ी (नेत्रप्रियता) नज़ील (अतिथि) को ख़ुद पे निसार (न्योछावर) होने के लिए राह बनाती रहती है।

हँसी और तबस्सुम की जंग में कभी ज़ंग नहीं लगता; नतीजतन (फलत:), जंगली फ़ित्रत तबस्सुम को हँसने के इख़्तियार (अख़्तियार अशुद्ध है।) (अधिकार) से भी महरूम कर देती है। ब अल्फ़ाज़े दीगर (दूसरे शब्दों में) बयाँ करूँ तो जो मुसकराहट ब कराहत (घृणा के साथ) दिख रही है, वह अस्ल में, उसकी बीमार मश्गूलियत (प्रवृत्ति) को ज़ाहिर कर रही है।

बेशक, तब्बसुम को अपनी राह बनाने में मशक़्क़त (श्रम) करनी पड़ी है, जिसके लिए ‘मशामे जाँ’ (आत्मा) से इज़ाज़त लेनी पड़ती है। अफ़्सोस (खेद है)! शातिर हँसी इग्लात (त्रुटि) करती रही और साय:दार/सायादार मक़ाम (पड़ाव) हासिल करती रही।

मस्लहते वक़्त (समय का स्वर) है, यह हँसी वह्मनाक और वह्मअसास (भ्रमपूर्ण और भ्रममूलक) है; क्योंकि वह्मी (संशयात्मक) हँसी का किरदार महज़ एक किराय:दार बनकर रह जाता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ अगस्त, २०२० ईसवी)