जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

शब्द बीज है काव्य सर्जन का,
कागज़ पे अंकुर हो ही जाएगा।
भाषा का मस्तक तिलक बनके,
संस्कृति उजाला कर ही जाएगा।
कहीं पे ये सदा उन्मुक्त दिखता है ,
तो कहीं पे गज़ब संयुक्त रहता है ।
वक्त पे संयोजन बनाकर ये ,
जग में नया सन्देश दे ही जाएगा।।
पुष्पित होकर इससे जब चमन में,
नव किसलय निकलती हैं ।
तो किसी को छाँव देती है ,
किसी के दृग में कसकती हैं।
किसी के चेहरा उजाला कर,
किसी का घाव भरती हैं।
किसी के दिल में पिघलकर,
किसी के मन में खटकती है।
चलो कुछ पुष्प चुनकर ‘जगन’
श्रृंगार सर्जन का करते हैं।
हृदय कविता का गुम्फित हो के,
काव्य सेवा शुरू हो ही जाएगा।
शब्द बीज है काव्य सर्जन का,
कागज़ पे अंकुर हो ही जाएगा।।
जब रवि गगन में उष्णित हो,
धरा को जगमगाएगा।
शब्द कागज पर चमत्कृत हो,
मन में हलचल मचाएगा।
शब्द कुछ चकित होकर,
फ़िजा में सुधा बरसाएगा।
अचम्भित हो गगन ,धरती,
बरबस हरष ही जाएगा।
जब कभी ऋतुएँ बदलती हैं,
काव्य भी रंग बदलता है।
फिर से यह परिष्कृत होकर,
किसी की वाणी में आ करके,
वतन की जुबां बन ही जाएगा।
शब्द बीज है काव्य सर्जन का,
कागज़ पे अंकुर हो ही जाएगा।।