— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मनमन्दिर की पूजा प्रत्येक व्यक्ति करना आरम्भ कर दे तो व्यर्थ के दिखनेवाले और मानव-मानव के बीच वर्जना की दीवार खड़ी करनेवाले समस्त आराधनास्थल औचित्यरहित हो जायें। नारद नारायण के परमभक्त माने गये हैं और देवी-देवगण के ऋषि भी। नारद विष्णु भगवान् की गतिविधियों से भ्रमित थे। उन्होंने देखा, अभी कुछ क्षण-पूर्व ही तो भगवान् कहीं और दिखे थे। ऐसे में, देवर्षि नारद से रहा नहीं गया और उन्होंने विष्णु भगवान् से प्रश्न कर ही लिया था– भगवन्! आप एक पल यहाँ दिखते हैं और दूजे पल वहाँ। आपकी यह लीला मेरी समझ से परे है। अब आप यह बतायें– आपका वास्तविक वासस्थान कहाँ है? इस पर भगवान् ने जो उत्तर दिया था, आज हम सभी को उसी को ग्रहण करना चाहिए। भगवान् ने उत्तर दिया था :–
“नाहं वसामि वैकुण्ठे, योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तिष्ठामि तत्र नारद।”
इसका अर्थ और आशय है– हे नारद! न मैं वैकुण्ठ में वास करता हूँ; न योगियों के हृदय में। मेरे भक्तगण जहाँ कहीं भी मेरा भजन करते हैं; मेरा स्मरण करते हैं, मैं वहीं स्थित हो जाता हूँ; प्रकट हो जाता हूँ; वास करता हूँ। यहाँ यह भी सार्थक हो जाता है, “हम भक्तन के भक्त हमारे।”
इस श्लोक का, स्वयं को भगवान् का भक्त कहनेवाला मनुष्य, गायन करता है, फिर भी मन्दिर-मस्जिद आदिक कथित धर्मस्थलों में अपने इष्ट का भ्रामक दर्शन करने जाता है। विचार तो इस विन्दु पर तटस्थ कोण से किया जाना चाहिए।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ अगस्त, २०२० ईसवी)