सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार की जन्मजयंती और जाति

इतिहासकार डॉ ओझा लिखते हैं कि पश्चिमी राजस्थान और गुजरात के क्षेत्र को “गुर्जर” कहा जाता था। इसलिए वहां के प्रतिहार राजाओं को सबसे पहले उनके पड़ोसी राष्ट्रकूट और पाल शासक “गुर्जर प्रतिहार” कहने लगे। मुंहणोत नैणसी ने प्रतिहारो की 26 शाखाओं का उल्लेख किया है जिनका राजस्थान ही नहीं गुजरात, काठियावाड़ और मध्य भारत में भी शासन रहा है। ग्वालियर अभिलेख में भी प्रतिहारों को “क्षत्रिय” और उनका वंश “सौमित्र” बताया गया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इन्हीं गुर्जर प्रतिहारों को “जुर्ज” कहा है ।

वर्तमान में सम्राट मिहिर भोज के वंशज अरुणोदय भी स्वयं को राजपूत बताते हैं। ग्वालियर, मंडोर, जोधपुर के किलों में इसके अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं और वह जरूरत पड़ने पर सरकार या न्यायालय को उक्त प्रमाण देने को तैयार भी हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग भी उन्हें राजपूत राजा के रूप में मान्यता देता है।

सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जाति विवाद कोई पहली घटना नहीं है जब किसी राजपूत राजा को ओबीसी या दलित वर्ग का बताने की कोशिश की गई है। शाहू जी महाराज को कुर्मी , पृथ्वीराज चौहान को गुर्जर बताने और मानने वाले भी बहुत से लोग मिल जाएंगे।

राजा सुहेलदेव को भी दलित (Paसी जाति का)बताने वालों की कमी नहीं है । चmaar जाति को सूर्यवंशी चंवर राजपूत और वाल्मीकि जाति को ब्राह्मण सिद्ध करने वाले मैसेज भी व्हाट्सएप पर खूब सैर कर रहे हैं। वह दिन भी दूर नहीं जब लोग महाराणा प्रताप को भी भील जाति का सिद्ध करने का प्रयास करेंगे ।

खैर, मेरा तो यह मानना है कि हमारे ये महान पूर्वज किसी जाति विशेष के नहीं हैं। वह सब के हैं और सब उनके हैं। इसीलिए मुझे इन जातियों के दावों पर कोई आपत्ति नहीं है बल्कि खुशी है।

बस मेरे मन मे एक ही प्रश्न अनुत्तरित है कि जिन जातियों के लोग शासक रहे हों, राजा रहे हों ; वह पिछड़े और दलित कैसे रह गए? उन जातियों का तथाकथित सवर्णो ने पूरे 5000 वर्षों तक शोषण कैसे कर लिया??

और अगर सचमुच में ऐसा हुआ है तो विश्व के इतिहास में यह पहली बार हुआ होगा कि “प्रजा” ने “राजा”,
“शासित वर्ग” ने “शासक” का, शोषण कर डाला???

(विनय सिंह बैस)