सात बहनो के नाम से जाना जानेवाला और अपनी नैसर्गिक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध पूर्वोत्तर-राज्यों के एक महत्त्वपूर्ण राज्य ‘असम’-स्थिति विश्वनाथ चारिआलि मे उत्तरप्रदेश हिन्दी-संस्थान एवं विश्वनाथ चारिआलि राष्ट्रभाषा प्रबोध विद्यालय परिचालना समिति के संयुक्त तत्त्वावधान मे विश्वनाथ चारिआलि, असम के सभागार मे गत दिवस द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। समारोह मे मुख्य अतिथि, उत्तरप्रदेश हिन्दी-संस्थान, लखनऊ की प्रधान सम्पादक डॉ० अमिता दुबे ने उद्घाटन-भाषण मे हिन्दी के प्रचार-प्रसार मे अपने संस्थान की भूमिका और योजनाओं पर सविस्तार प्रकाश डाला था। प्रयागराज से पधारे भाषाविज्ञानी एवं समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विशिष्ट अतिथि के रूप मे कहा, “हमारे लिए गर्व और गौरव का विषय है कि इस हिन्दीतर राज्य मे हिन्दीभाषा का प्रचार-प्रसार पूर्ण तन्मयता के साथ किया जा रहा है। सभी विभेदों को भुलाकर अब भारतीय भाषाओं को हिन्दी के साथ मिलकर चलना होगा और यह तभी सम्भव है, जब किसी भी भारतीय भाषा के प्रति हमारे मन के किसी कोने मे किसी भी प्रकार का पूर्वग्रह न पैठा हो। हम जब भाषिक परिप्रेक्ष्य मे राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं तब हमारे सम्मुख ‘एक राष्ट्र-एक भाषा’ का सिद्धान्त और व्यवहार’ का एक विकट प्रश्न आ खड़ा होता है; क्योंकि इसे लागू करने के मार्ग मे ‘विविध मातृभाषाएँ’ आड़े आती अनुभव होंगी। इन विसंगतियों को दूर करने के लिए सद्भावपूर्ण वातावरण मे समाज और राजनीति-स्तर पर संवाद करने की आवश्यकता है।”

राष्ट्रभाषा प्रबोध विद्यालय के अध्यक्ष प्रभुनाथ सिंह ने उद्घाटन-सत्र की अध्यक्षता की।
इस द्विदिवसीय आयोजन मे उत्तरप्रदेश, दिल्ली, मेघालय, सिक्किम, मिज़ोरम, नागालैण्ड, असम, अरुणाचलप्रदेश आदिक राज्यों के विश्वविद्यालयों तथा अन्य शिक्षण-संस्थाओं की अध्यापक-अध्यापिकाओं, साहित्यकारों तथा समीक्षकों ने अलग-अलग सत्रों मे ‘भाषिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य मे राष्ट्रीय एकता’ पर अपने शोधपत्रों के वाचन और मौखिक व्याख्यान किये थे।
प्रथम सत्र के अन्तर्गत डॉ० सुनीलकुमार तिवारी की अध्यक्षता मे ‘राष्ट्रीय एकता का भाषाई परिप्रेक्ष्य’ विषय पर डॉ० अनुशब्द तथा डॉ० चन्द्रशेखर चौबे; द्वितीय सत्र मे प्रो० दिलीप कुमार मेधी की अध्यक्षता मे ‘राष्ट्रीय एकता का साहित्यिक परिप्रेक्ष्य’ विषय पर हरि प्रसाद लुइटेल, डॉ० आलोक रंजन पाण्डेय, डॉ० परिस्मिता बरदलै तथा डॉ० नन्दिता दत्त ने अपने शोधपत्र के वाचन किये।
दूसरे दिन श्री-श्री सार्वजनिक धर्मशाला सभागार मे राष्ट्रीय एकता का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य विषय पर तृतीय सत्र के अन्तर्गत प्रो० प्रमोद मीणा की अध्यक्षता मे डॉ० राजीवरंजन प्रसाद तथा श्रीमती गीता वर्मा ने विचार व्यक्त किये। चतुर्थ सत्र के अन्तर्गत ‘राष्ट्रीय एकता का भाषाई, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य तथा पूर्वोत्तर-भारत’ विषय पर डॉ० अनिता पण्डा की अध्यक्षता मे डॉ० बी० पी० फ़िलिप, श्रीमती रीता सिंह सर्जना, जय शिवानी तथा डॉ० चुकी भूटिया ने अपने विचार व्यक्त किये।
अन्तिम दिन आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने दीप-प्रज्वलन कर, समापनसत्र का शुभारम्भ किया था। इस अवसर पर उन्होंने और डॉ० अमिता दुबे ने आठ हिन्दीसेवियों को ‘भाषागौरव-सम्मान’ से विभूषित किया था। हिन्दीतर राज्य से देवनागरी लिपि और हिन्दीभाषा मे प्रकाशित पाँच पुस्तकों :― (१) पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थी दिव्यज्योति बरुवा के कविता-संग्रह ‘दिव्य मन’ (२) हिन्दी-प्रचारिका मनीषा पाल के कविता-संग्रह ‘हर लम्हा कुछ कहता है’ (३) हिन्दी-प्रचारिका सैयदा आनोवारा ख़ातुन के कहानी-संग्रह ‘ज़िन्दगी तेरे लिए!’ (४) स्मृति-शेष स्वर्णलता हजारिका के बाल-उपन्यास ‘कुतु और सुमन’ (५) हिन्दी-प्रचारक संतोषकुमार महतो के काव्य-संग्रह ‘शब्द-संजीवनी’ का लोकार्पण आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, डॉ० अमिता दुबे, डॉ० क्षीरदाकुमार शइकिया तथा डॉ० सरजीत दास ने किया था। इस अवसर पर प्रभुनाथ सिंह की अध्यक्षता मे डॉ० क्षीरदाकुमार शइकिया और डॉ० चिन्तामणि शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किये थे। इसी अवसर पर मंचस्थ समस्त अतिथियों को फुलाम गामोछा तथा प्रतीकचिह्न ‘खलार’ भेंट कर सम्मानित किया गया। समारोह का समापन सांस्कृतिक सन्ध्या से किया गया। इस अवसर विनोदकुमार गुप्ता, सूर्यनारायण पाण्डेय, मदनगोपाल साहू, अरुण साहनी, सुरेन्द्र कुमार साहनी, सुधन साहनी, लोकनाथ शास्त्री, बजरंग रौनियार, वन्दना दास, ज्योतिकुमारी दास, कल्पना पाल, धरित्री राय बरुवा, चित्र प्रसाद पौड़ेल, प्रेम विश्वकर्मा तथा देश के अनेक राज्यों से आये प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। उक्त द्विदिवसीय राष्ट्रीय समारोह का संयोजन सचिव संतोष कुमार महतो ने किया था।